यादें बड़ी कमाल की चीजें होती हैं। हम अपनी यादों में पूरे संसार को समेटे रहते हैं। ये यादें अच्छी, बुरी, दुख देने वाली और प्रसन्नता देने वाली हो सकती हैं। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि हम अपनी यादों में अपने दु:खद संस्मरणों को ज़्यादा समेटे रहते हैं। यही कारण है हम अपने अतीत से सीखते कम हैं। उसका स्मरण ज्यादा करते हैं। उन यादों से सीख कर आगे नहीं बढ़ते। उन्हें याद कर अवसाद में पहुँच जाते हैं। कहीं-कभी कट्टर हो जाते हैं। हिंसक भी हो उठते हैं। इसका ताज़ातरीन उदाहरण तालिबान है। न जाने कौन सी स्मृतियाँ हैं, जो इस संगठन को मानवीय रूप में बने रहने से रोकती हैं?
अकबर के समय तक हर स्तर पर हिंदु जीवन पद्धति और तौर-तरीकों को स्वीकार करने की मंशा दिखती थी। यही कारण था कि अकबर ने प्रशासन में हिंदुओं को बराबरी से सहभागी बनाया। कई हिंदु अधिकारियों को बड़े पदों पर नियुक्त किया। फिर चाहे वह सैन्य प्रशासन हो या नागरिक। हिंदुओं के प्रभाव में उसने गौहत्या पर प्रतिबंध लगाया। इस अपराध के लिए मौत की सज़ा तक का प्रावधान किया। मगर अकबर के बाद हालात तेजी से बदले। मसलन, 1632 में शाह जहाँ ने एक आदेश जारी कर नए हिंदु मंदिरों के निर्माण पर रोक लगा दी। साथ ही निर्माणाधीन मंदिरों को गिराने का फ
बुद्ध अपने प्रतीत्य समुत्पाद के तीसरे भाग अर्थात् समाधि की बात करते हैं। भारतीय दर्शन में समाधि अत्यधिक महत्त्वपूर्ण विचार है। बुद्ध समाधि में तीन चीजों को रखते हैं। इनमें पहली है, ‘सम्यक प्रयत्न’। प्रयत्न से यहाँ तात्पर्य है ‘व्यायाम’। हमने अक़्सर सुना होगा, “पहला सुख, निरोगी काया”। यानि जब हम स्वस्थ होंगे, तभी मन ठीक से कार्य करने की स्थिति में होगा।
अरसा हो गया। इतने वर्षों से बापू को एक ही पोजिशन में बैठे हुए देखते-देखते। झुके हुए से कंधे। बंद आँखें। भावविहीन चेहरा। कहने की जरूरत नहीं, उम्मीदविहीन भी। चेहरा भावविहीन तो उसी दिन से हो गया था, जिस दिन देश को दो टुकड़ों में बाँटने का निर्णय लिया गया था। निर्णय ग़ैरों ने लिया था। उस पर कोई रंज नहीं था। पर मोहर तो अपने ही लोगों ने लगाई थी। इतनी जल्दी थी आज़ाद होने की, बापू के विचारों से आजाद होने की?
कल से आँखें ख़ुशी से नम हैं। ओलम्पिक में रोज़ाना ही कोई न कोई इतिहास रचा जा रहा है। कल क़तर के एक खिलाड़ी ने न केवल इतिहास रचा, बल्कि मुझे इतिहास की एक घटना याद भी दिला दी। इस खिलाड़ी का नाम है मुताज़ एज़ा बर्शिम।
कोरोना काल में न जाने कितने लोगों को अपनी आजीविका से विरत होना पड़ा। बहुतों ने इसे नई आजीविका के अवसर के रूप में देखा और नए उपक्रम खड़े कर दिए। इस दौर में एक तरफ़ कई लोग आजीविका खोने के कारण निर्धनता को प्राप्त हुए, वहीं दूसरी ओर कई लोगों ने विविध उपायों से खूब धन अर्जित किया। मुझे याद आ रहा है कि हमारे कई मित्रों को ज़रूरत के वक़्त जीवन-रक्षक औषधियों और जीवन-रक्षक यंत्रों का कई गुना अधिक मूल्य चुकाना पड़ा। क्योंकि बहुत से औषधि विक्रेता निर्ममतापूर्वक उस समय केवल धन कमा रहे थे। अस्पतालों तक ने मानव जीवन के मुकाबले धन कमाने को वरीयता दी। यह
सौभाग्य से मुझे भारतीय सेना के साथ काम करने का अवसर प्राप्त हुआ। मैं व्यक्तिगत तौर पर जिन भी सैनिकों से संपर्क में आया, उनसे चर्चा, हास-परिहास या यहाँ तक कि सामान्य बातचीत में भी किसी सैनिक को देश के अलावा किसी अन्य पर गर्व करते नहीं देखा। हाँ, उन्हें अपनी कंपनी, अपनी रेजीमेंट, अपनी बटालियन के लिए ज़रूर जीत की भावना से भरे हुए पाया। लेकिन उसमें भी सेना की दूसरी कंपनी के प्रति उतना ही सम्मान और गर्व भी देखा, जितना अपनी कंपनी के प्रति रहता है।
किसी ने व्हाट्स एप पर यह कहानी मुझे भेजी। आज के दौर में जब हर कोई एक-दूसरे को गिराने की कोशिश करता है। कीचड़ उछालता है, तब यह कहानी बड़ी प्रेरक सीख देती है हमें। और चूँकि #अपनीडिजिटलडायरी पर इस तरह की चीजों को प्रमुखता से दर्ज़ किया जाता है, इसलिए सोचा डायरी पर इसे एक पन्ने की तरह जोड़ते हैं। डायरी के पाठकों के लिए। तो कहानी यूँ है....
मेरे मित्र के बॉस नेत्रहीन हैं। उनका मानना है कि उनके द्वारा किए गए सभी कार्य सही ही हैं। चाहे वे कार्य दूसरों की नज़र में ग़लत या अनुचित ही क्यों न हो। हमारी नज़र में हम अक्सर सही ही होते हैं। दुर्योधन अपनी दृष्टि से, कहीं से भी स्वयं को अनुचित कैसे बता सकता है। चाहे दुर्योधन के आदेश से भरी सभा में किसी महिला की गरिमा को ही क्यों न चोट पहुँचाई गई हो।