अंग्रेजों ने जब भारत में न्याय-व्यवस्था बनाना शुरू की तो शुरू में कुछ संशोधनों के साथ मुसलिम फौज़दारी कानून लागू किए। ख़ास तौर पर, उन पर जगहों में, जहाँ वे पहले से अमल में थे। हालाँकि अंग्रेजों द्वारा किए गए संशोधनों को अपना असर दिखाने में कुछ ज़्यादा ही समय लग गया। उदाहरण के लिए, 1789 तक भी बंगाल में मुसलिम कानून के मुताबिक डाकू-लुटेरों को उनके हाथ या पैर काट देने की सज़ा दी जाती थी। जबकि अंग्रेज यह सज़ा हटा चुके थे। इसके अलावा, अंग्रेजों ने उन इलाकों में अपने कानून लागू किए, जहाँ से मुसलिम फौज़दारी कानून हट चुका था। जैसे, मराठा शासन के अधीन रहे इलाके। इसका कारण ये कि आपराधिक
अंग्रेजों के आने से पहले हिंदुस्तान में कानून की अपनी व्यवस्था थी। हिंदु और मुसलमानों की अपनी विधायी संस्थाएँ थीं। लेकिन मुग़लिया सल्तनत के ढहने के बाद ग़ैरज़िम्मेदार ताक़तों के तौर-तरीकों की वज़ह से वे या तो नष्ट हो गई थीं या काम करना बंद कर चुकी थीं। वैसे, एक न्यायिक संस्था अब भी थी, ग्राम पंचायतों की। लेकिन उसकी कोई सटीक कानून संहिता नहीं थी। इसकी गतिविधियाँ और फ़ैसले पिछले फैसलों या परंपराओं पर आधारित होते थे, जिनकी प्रकृति स्थानीय थी। इसीलिए इनके फ़़ैसलों और गतिविधियों की स्वीकार्यता भी स्थानीय स्तर पर ही थी। स्पष्ट अर्थों में पंचायत कोई न्यायिक अदालत नहीं, बल्कि मध्स्थता क
यद्यपि मैकॉले सही थे। इसके बावज़ूद ध्यान रखने की बात है कि भारत की पत्रकारिता उस वक़्त लगभग पूरी तरह यूरोपीय समाचार जगत के हाथ में थी। इसमें अधिकांशत: ब्रिटिश समुदाय के हितों की वक़ालत ही की जाती थी। ऐसी पत्रकारिता बहुत कम थी जो ‘आम राय’ से प्रभावित हो, या उस पर असर डाले। फिर भाषा भी अंग्रेजी थी उसकी और अधिकांश भारतीय हिंदी भाषी। इससे स्वाभाविक तौर पर इसमें उन्हीं की राय प्रदर्शित होती थी, जो अंग्रेजी पढ़ना-लिखना जानते थे। बहुसंख्य लोगों की राय इसमें नहीं ही होती थी। इसीलिए तब सरकार ने तय किया था कि
बेंटिंक ने जब प्रशासनिक सुधार शुरू किए तो सभी प्रमुख विचारों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की। उन्होंने कार्यपालिक और न्यायिक शक्तियों को मिलाने पर जोर नहीं दिया। उन्हें एक-दूसरे पर निर्भर बनाया। बंगाल में अब तक कलेक्टर-न्यायिक दंडाधिकारी हर जिले में नियुक्त हो चुके थे। उनके ही नियंत्रण में पुलिस थी। लगान से जुड़े मामलों में न्यायिक शक्तियाँ भी थीं। जिला न्यायाधीश अलग थे। वे कलेक्टर-न्यायिक दंडाधिकारी द्वारा भेजे गए आपराधिक मामलों की सुनवाई करते थे। निचली भारतीय अदालतों के विरुद्ध दीवानी मामलों की अपील पर सुनवाई करना भी उनके&nb
भारत के बारे में जेम्स मिल जैसे उपयोगितावादी विचारकों का ध्यान भी मुख्य रूप से भू-राजस्व के मसले पर ही था। मिल इस भारतीय विचार को मान्यता देते थे कि ज़मीन की असल मालिक सरकार (राजा) है। लेकिन उन जैसों के सामने समस्या अभी ये थी कि सरकार को मिलने वाला लगान कैसे तय हो?
ये बादल भी न, कभी बरसते हैं, कभी नहीं। कहीं ख़ूब बरसते हैं। कहीं बिल्कुल नहीं या बहुत कम। बादलों की इस मनमानी और इससे होने वाली कुछ मूलभूत किस्म की दिक्क़तों से ख़बरनवीस परेशान। सो, जैसे ही पानी से भरे बादल का टुकड़ा एक ख़बरखोजी की छत से गुजरा, उसने उसे धर लिया। इरादा सीधे दो-टूक बात करने का था। लिहाज़ा, बिना भूमिका सीधे सवाल-ज़वाब शुरू। शुरुआत, अलबत्ता, बादल के उस टुकड़े ने की क्योंकि उसे बीच रास्ते रोक जो लिया गया था...
बादल : कौन हो भाई? क्यों रोक लिया हमें?
रिपोर्टर : मैं रिपोर्टर। आपसे बहुत जल्दी से कुछ सवाल-ज़वाब करने हैं।
ईसाई पंथ के कट्टर समर्थकों को पहली बड़ी सफलता 1813 में मिली। उस साल के अधिकार पत्र अधिनियम के जरिए ब्रिटेन की सरकार ने भारत में बिशप (ईसाई धर्मगुरु) की नियुक्ति के लिए कंपनी को बाध्य किया। बिशप का मुख्यालय कलकत्ता में रखा गया। अंग्रेजों के अधिकार वाला पूरा भारतीय इलाका उनका कार्यक्षेत्र बनाया गया। उन्हें ज़िम्मेदारी दी गई कि इस पूरे इलाके को ईसाई मिशनरियों के कामकाज के लिए सुलभ बनाएं। इस कानून ने कंपनी को उसका व्यावसायिक एकाधिकारवाद थोड़ा और छोड़ने के लिए विवश किया। वैसे, कंपनी ने जब से 1757 में बंगाल पर आधिपत्य किया, तभी से व्यापार का मसला उसके लिए दूसरे दर
कृष्ण एक अभिशप्त मानव, निर्वासित देवता...। सुनने में अटपटा लगा न, अस्वीकार्य भी? ऐसा ही होता है। सच अक़्सर अस्वीकार्य और कड़वा सा लगता है। इसीलिए उस पर महिमामंडन का लेप, अलौकिता का छिड़काव और आदर्श का आवरण डालने की कोशिश की जाती है। और फिर निरपेक्ष सत्य को अपना-अपना सच बनाकर कितने ख़ुश हो लेते हैं हम मनुष्य।
ब्रिटिश शासन में कई प्रशासक-विचारक इस पक्ष में थे कि भारतीय राजाओं और उनके राज्यों को संरक्षण देना चाहिए। इससे भारतीय संस्कृति को नैसर्गिक रूप से पुष्पित-पल्लवित होने की गुंजाइश मिलती रहेगी। साथ ही जिन अहम स्थानीय लोगों को सरकारी अधिकारी-कर्मचारी के रूप में ब्रिटिश भारत के पदक्रम में जगह नहीं मिली, उन्हें पुनर्वासित किया जा सकेगा। इस तरह शासक और शासितों के बीच सीधा संबंध स्थापित होगा, जो स्थायित्व की नींव बनेगा। उनका यह भी मानना था कि आम लोगों के लिए सरकार की उपलब्धता सहज होनी चाहिए। न्यायिक प्रक्रिया की गति भी तेज होनी चाहिए। उनके मुताबिक, यह सब न्यायपालिका और कार्यपालिक
जब अंग्रेजों ने सत्ता संभाली तो शुरू में उनके पास शासन करने के लिए न पर्याप्त लोग थे, न क्षमता। मग़र वे शासन करते रहना चाहते थे। लिहाज़ा सबसे पहले रॉबर्ट क्लाइव ने ‘दोहरे शासन’ का नुस्खा आज़माया। इसमें राजाओं-नवाबों के शासन को मुखौटे की तरह चलने दिया गया। जबकि, अंग्रेज परदे के पीछे सक्रिय रहते थे। यह व्यवस्था अंग्रेजों को शुरू में फ़ायदे की लगी। क्योंकि सीधी ज़िम्मेदारी के बिना वे व्यवस्था से पूरे लाभ ले रहे थे। यह उनका मुख्य मक़सद भी था। इस समय तक मोटे तौर पर, उनका मानना था कि हमें भारत में