भारत में ब्रिटिश समुदाय के कला और शिल्प को भी पेशेवर और शौक़िया, दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है। टिली कैटल (1796-1776) के मद्रास आने के बाद कई चित्रकार भारत आए्र। इनमें कैटल, जॉन ज़ॉफनी (1783-1789), आर्थर डेविस (1785-1795) ने तैल चित्र बनाए। लेकिन उनकी कृतियों को आबोहवा ने ख़राब कर दिया। वे आकार में भी इतनी बड़ी थीं कि उन्हें इंग्लैंड ले जाना मुश्किल था। ऐसे में छोटे आकार के चित्र बनाने वाले चित्रकारों को लाभ मिला। जॉन स्मार्ट (1785-1795) और ओज़ियस हंफ्री (1785-1787) के नाम इनमें प्रमुख हैं। उनके बाद के चित्रकार भी उतने ही सक्षम हुए। जैसे, 19वीं सदी के शुरू में जॉर्ज चिनरी (1
ब्रिटिश भारत के शुरुआती दौर में कई सैन्य-असैन्य अंग्रेज लेखक उभरे। इन्ही में एक थे, रॉबर्ट ऑरमे। उनकी क़िताब- ‘हिस्ट्री ऑफ मिलिट्री ट्रांजेक्शन ऑफ द ब्रिटिश नेशन इन इंडोस्तान’ 1763 में प्रकाशित हुई। जबकि जॉन मैल्कम की ‘पॉलिटिकल हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ 1826 में आई। वहीं, मॉन्सटुअर्ट एल्फिंस्टन की ‘हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ 1841 और जेम्स ग्रांट डफ की ‘हिस्ट्री ऑफ मराठा’ 1826 में आई। इनमें से मैल्कम ने अंग्रेजों के तौर-तरीकों को सही ठहराने की ही कोशिश की। वे लिखते हैं, “इंग्लैंड ने पूरब में जो साम्रा
संख्या भले कम थी, लेकिन अंग्रेजों में कई लोग मानते थे कि भारत के बारे में अधिक जानना चाहिए। जैसे- सर विलियम जोन्स। उन्होंने 18वीं सदी के अंत में संस्कृत साहित्य की समृद्धता के बारे में जानकारियां दीं। उन्होंने ही 1785 में ‘द एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल’ की स्थापना की, जो आगे भारत से जुड़ी अंग्रेजों की जिज्ञासाओं की पूर्ति का केंद्र बन गई। सोसायटी ने ‘एशियाटिक रिसर्चर्स’ के नाम से एक अख़बार भी निकाला। इसके पहले ही संस्करण में बम्बई के नज़दीक एलीफेंटा की गुफाओं से जुड़े प्रसंग शामिल क
भारत में शुरू के 50 साल तक अंग्रेज आश्वस्त ही नहीं थे कि यहाँ उनका शासन लंबा भी हो सकता है। वे ख़ुद को असुरक्षित महसूस करते थे। इतने कि आलोचना करते समय भी सावधान रहते कि कहीं उनकी भावनाएँ किसी को आहत न कर दें। बेवज़ह उनके शासन के लिए नई मुसीबत न आन पड़े। उनमें तब भारतीय संस्कृति के प्रति थोड़ा सम्मान भी था। शायद इसीलिए कई अंग्रेज अफ़सर फारसी पढ़ने-बोलने लगे थे। वह उस समय शासन और साहित्य की भाषा थी। एक स्तर तक वे अपने को भारत के कुलीन वर्ग का हिस्सा समझने लगे थे। लेक
लॉर्ड हेस्टिंग्स भले साम्राज्य विस्तार के समर्थक रहे, लेकिन उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था में काफ़ी सुधार भी किए। उनके कार्यकाल में कई उल्लेखनीय प्रशासक सामने आए। जैसे- मोंस्टुअर्ट एल्फिंस्टन (दक्षिण), कर्नल टॉड (राजपुताना) और थॉमस मुनरो (मद्रास)। ये लोग हिंदुस्तान की वास्तविकताओं, यहाँ की भौगोलिक, प्रशासनिक आवश्यकताओं से अच्छी तरह परिचित थे। लिहाज़ा उन्होंने इन्हीं के मुताबिक अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों को संज़ीदगी से स्वीकारा और उनका निर्वहन किया।
अब तक दक्षिण में मैसूर के सुल्तान हैदर अली की फ्रांसीसियों से दोस्ती हो चुकी थी। वे अंग्रेजों के ख़िलाफ़ संघर्ष में उसकी सहायता कर रहे थे। इससे उत्साहित हैदर अली ने 1780 में लगभग 90,000 सैनिकों और 100 से ज़्यादा तोपों के साथ मद्रास पर धावा बोल दिया। उसके सैनिकों ने फोर्ट सेंट जॉर्ज को हर तरफ़ से घेर लिया। ऐसे में मद्रास की प्रशासक परिषद ने वॉरेन हेस्टिंग्स से मदद माँगी। हेस्टिंग्स ने तुरंत सर आयर कूट के नेतृत्व में काफ़ी धन और बड़ा सैन्य बल मद्रास भेजा। आयर कूट छापामार युद्ध के विशेषज्ञ थे। उन्होंने पोर्टो नोवो की लड़ाई में हैदर अली को हरा दिया। इस पराजय के एक साल बाद 1782
मीर क़ासिम अंग्रेजों की कठपुतली बनने को तैयार नहीं हुआ। उसने कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों में दख़लंदाज़ी शुरू कर दी। इसके कारण थे। मसलन- मुग़ल बादशाह के पुराने फ़रमान की आड़ लेकर अंग्रेज करमुक्त व्यापार को अपना अधिकार समझने लगे थे। जबकि उस फ़रमान में अंग्रेजों को सिर्फ़ बंदरग़ाहों पर संचालित व्यावसायिक गतिविधियों में करों से छूट दी गई थी। हिंदुस्तान की ज़मीन पर नहीं। लेकिन अंग्रेज उस फ़रमान का दुरुपयोग कर मोटा मुनाफ़ा कमा रहे थे। इससे राजकोष को नुकसान हो रहा था। मीर क़ासिम ने जब यह देखा तो उसने सभी व्यापारिक गतिविधियाँ करमुक्त कर दीं।
अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी के कारोबारी जब पहली समुद्री यात्रा पर निकले तो भारत नहीं, सुमात्रा पहुँचे थे। लेकिन 1608 में कंपनी के एजेंटों- बैंटम और मॉल्यूकस ने प्रबंधन को बताया कि भारत के कच्चे सूत की ग्राहकों में काफ़ी माँग है। लिहाज़ा भारत में कंपनी का वाणिज्यिक केंद्र होना चाहिए। इससे भारत के कच्चे सूत की ख़रीद-फ़रोख़्त आसान होगी। इसके बाद कंपनी की आग्रह पर तत्कालीन मुग़ल बादशाह शाह जहाँ ने उसे हिंदुस्तान में वाणिज्यिक केंद्र स्थापित करने की अनुमति दी। हालाँकि पुर्तगालियों ने इसका विरोध किया क्योंकि वे भारत में पहले से थे। वे भारत पहुँचने वाले पहले यूरोपीय थे। लेकिन उनका विरोध बेअ
19वीं सदी की शुरुआत में मध्य और उत्तर भारत मराठा राजाओं के नियंत्रण में था। ये सब पेशवा के लिए निष्ठावान कहे जाते थे। पर नाममात्र के लिए। इनके प्रशासन का स्वरूप कुछ ऐसा था कि प्रभावी तरीके से राजकोष में राजस्व आता रहे, बस। राजकोष के लिए राजस्व इकट्ठा करने के तीन मुख्य तरीके थे। पहला- सीधे जनता से कर वसूली। दूसरा- युद्धों में लूटी गई दौलत। तीसरा- पराजित राजाओं से उनकी सुरक्षा के बदले मिलने वाला धन। लेकिन ये तरीके ज़्यदा सफल नहीं हुए। धीरे-धीरे बड़े इलाके मराठाओं के प्रभ
सन् 1748 से 1762 के बीच उत्तर-पश्चिमी भारत पर कई बार अफ़ग़ानों के हमले हुए। जबकि मध्य और उत्तरी भारत पर मराठों का कब्ज़ा हो गया। उन्हें मुग़लों का उत्तराधिकारी समझा जाने लगा। हालाँकि मराठों ने भी हिंदु होने के बावज़ूद मंदिरों को तोड़ा और गायों तथा पुजारियों तक को मौत के घाट उतारा। वे जहाँ भी गए अपने पीछे तबाही के निशान छोड़ गए। इस समय हिंदुस्तान में कोई मज़बूत केंद्रीय सत्ता नहीं थी। इससे हिंदुस्तान के तटवर्ती क्षेत्रों में शिविर स्थापित कर चुके यूरोप के छोटे कारोबारियों पर भी इसका विपरीत असर पड़ा। हिंदुस्तान की केंद्रीय सत्ता ने अब तक उनकी सुरक्षा का ज़िम्मा अपने कंधों पर ले