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पहचान खोना अभेद्य किले को जीतने सा है!

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 18/9/2021

अभी धूप भी थी और बरसात भी। बचपन में ऐसी स्थिति में हम कहते थे चिड़ा-चिड़ी का ब्याह हो रहा है। बड़ा प्रतीक है, मौसम का यह फ्यूजन (मिश्रण)। अटपटा और विचित्र भी। पर जीवन अक्सर ऐसा ही होता है। चिड़ा-चिड़ी मात्र प्रतीक हैं और धूप में बरसात की बूँदें असली सच। ----- आस्था और भरोसा हमें अगली सुबह का सूरज देखने के लिए आश्वस्त करता है। हम आज से ऊब चुके होते हैं। इसलिए हर रात आज की स्मृतियों को दफन करते हैं। एक आह के साथ उन स्मृतियों को ठीक-ठाक करके तह में लपेटकर तकिये के नीचे रखकर सो जाते हैं कि भोर तक वे फुर्र हो जाएँगी पर सच यह नहीं होता। वे रातभर में मंजकर गाढ़ी और दुरूह हो जाती हैं।

ब्रिटिश शासन के शुरुआती दौर में भारत में शिक्षा की स्थिति कैसी थी?

माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 17/9/2021

अंग्रेज जब भारत आए तो यहाँ मुख्य रूप से धार्मिक शिक्षा ही दी जाती थी। हिंदु समाज की शिक्षा पर ब्राह्मणों का एकाधिकार था। वे संस्कृत भाषा के जरिए धार्मिक साहित्य का अध्ययन-अध्यापन किया करते थे। जबकि, मुसलिमों में अरबी भाषा के माध्यम से शिक्षा दी जाती थी। लेकिन यह भाषा हिंदुस्तान में ज़्यादा बोली नहीं जाती थी। कुछ विद्यालयों में फ़ारसी में भी पढ़ाई कराई जाती थी। यह 1837 तक हिंदुस्तान सरकार की अधिकृत भाषा रही। वैसे, हिंदु और मुसलिम शिक्षा में काफी-कुछ एक सा था। दोनों में ऐसी भाषाओं के ज़रिए पठन-पाठन हो रहा था, जिन्हें सामान्य लोग नहीं बोलते थे। दोनों परंपरागत ज्ञान के साथ आगे बढ़

मानव अंग-विच्छेद की प्रक्रिया में हिस्सा लेने वाले पहले हिन्दु चिकित्सक कौन थे?

माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 16/9/2021

नि:संदेह पश्चिमीकरण के कुछ ज़ाहिर पहलुओं को लेकर भारत में आशंकाएँ थीं। उदाहरण के तौर पर ब्रिटिश न्याय व्यवस्था, जिसके बारे में मैकॉले ने लिखा था, “वॉरेन हेस्टिंग्स के समय सर्वोच्च न्यायालय आतंक का प्रतीक बन गया था। यह अजनबी न्यायालय कब, क्या करेगा, कोई नहीं जानता था। इसमें एक भी ऐसा न्यायाधीश नहीं था जो उन लाखों लोगों की भाषा ठीक से समझे, जिनके संबंध में उसे फ़ैसले सुनाने थे। इसका पूरा रिकॉर्ड अनजान भाषा में लिखा और रखा जाता था। फ़ैसले अजनबी भाषा में सुनाए जाते थे।… इस सर्वोच्च न्यायालय के न्याय की तुलना में पिछले अत्याचारी शासकों के अन्याय भी किसी आशीर्वाद की तरह लगने लगे थ

भारत के ठग अपने काम काे सही ठहराने के लिए कौन सा धार्मिक किस्सा सुनाते थे?

माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 15/9/2021

हिंदुस्तान में ठगी की समस्या काफ़ी पुरानी थी। मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के शासन के दौरान एक फ्रांसीसी पर्यटक आए थे, डि थेवनॉट। उन्होंने लिखा है, “दिल्ली से आगरा के बीच पूरा रास्ता ठगों से अटा पड़ा है। ठग दुनिया में सबसे धूर्त लुटेरे हैं… वे शिकार को फाँसने के लिए कुछ निश्चित तरक़ीबें लगाते हैं। उनके साथ एक फंदा भी होता है, जिसे वे शिकार के नज़दीक पहुँचते ही पलक झपकते उसके गले में कस देते हैं। इतने सटीक तरीके से कि कभी विफल नहीं होते।” अंग्रेजों को इस समस्या की गंभीरता का अहसास पहली बार 18वीं सदी के अंत में हुआ। लेकिन उन्होंने 1829

भारत से सती प्रथा ख़त्म करने के लिए अंग्रेजों ने क्या प्रक्रिया अपनाई?

माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 14/9/2021

इस तरह कंपनी के सैन्य कर्मचारी हों या फिर नागरिक प्रशासन से जुड़े, सभी में सती प्रथा के प्रति वितृष्णा बढ़ रही थी। इसका दबाव भारत सरकार और लंदन में बैठे कंपनी के निदेशक भी महसूस कर रहे थे। लिहाज़ा 17 जून 1823 को उन्होंने भारत के तत्कालीन वायसराय को पत्र भेजा। इसमें लिखा, “आप जानते हैं कि ब्रिटिश संसद और आम जनता का भी, पूरा ध्यान इन दिनों इसी विषय (सती प्रथा) पर है। ऐसा लगता है कि यह प्रथा भारत के विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग स्वरूप में है।… इसीलिए आपने ये नियम बनाया था कि अगर कहीं कोई महिला स्वेच्छा से सती होना चाहती है, तो धार्मिक आधार की पुष्टि के बाद उसे इजाज़त दी जाए। लेकिन

भारत में बच्चियों को मारने या महिलाओं को सती बनाने के तरीके कैसे थे?

माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 13/9/2021

नवजात बच्चियों की हत्या का विवरण देते हुए स्लीमैन लिखते हैं, “एक ख़ास किस्म की जड़ी का रस नवजात बच्चियों के मुँह में डाला जाता था। फिर उन्हीं के पेट से निकली पहली विष्ठा (मल) उनके मुँह में भर दी जाती थी। इससे बच्ची थोड़ी ही देर में मर जाती थी। इसके बाद उसे उसी कमरे में गड्‌ढा खोदकर गाड़ दिया जाता था, जहाँ उनका जन्म हुआ। फिर उस गड़ढे को मिट्‌टी और गोबर से ढँक दिया जाता था। इसके बाद 13वें दिन परिवार के कुल पुरोहित को उसी कमरे में भोजन कराने का नियम था। अपने लिए भोजन पुरोहित ख़ुद बनाता था, उसी कमरे में। उसे लकड़ियाँ दी जातीं। घी, जौ, चावल और तिल भी। वह काँसे के बर्तन में जौ, चावल औ

लक्ष्य पाने के लिए लगातार चलना ज़रूरी है, छलना नहीं

निकेश जैन, बेंगलुरू, कर्नाटक से, 13/9/2021

बात उन दिनों की है, जब मैं स्कूल में पढ़ता था। माथुर सर, हमारे गणित के शिक्षक हुआ करते थे। उन्होंने मुझे छठवीं से आठवीं तक गणित पढ़ाई। आज जो भी थोड़ा-बहुत मुझे इस विषय का ज्ञान है, निश्चित तौर पर माथुर सर की वज़ह से। लेकिन उन्होंने मुझे एक और चीज सिखाई, जो जीवन में हमेशा काम आई। वह है, ईमानदारी।

अंग्रेज भारत में दास प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुप्रथाएँ रोक क्यों नहीं सके?

माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 12/9/2021

ब्रिटेन में 18वीं सदी के ख़त्म होने तक सरकार पर यह दबाव बनाया जाने लगा था कि कंपनी के अधिकार वाले इलाकों को ईसाई धर्मप्रचार के लिए खोला जाए। यह दबाव बनाने वाले पूरी तरह आश्वस्त थे कि ख़ासकर भारतीय समाज को बड़े बदलाव की ज़रूरत है। वे मानते थे कि सरकार के माध्यम से कुछ ऐसे कार्यों, प्रथाओं का रुकवाया जा सकता है जो ‘नैतिक कानून’ के ख़िलाफ़ हैं। इस दृष्टिकोण से हालाँकि कंपनी डरी हुई थी। इसलिए उसने पहले मिशनरियों, सुधारवादियों और सुधारों का विरोध किया। पर 1813 के अधिकार पत्र अधिनियम ने उसे मज़बूर किया कि वह अपने अधिकार क्षेत्रों में ईसाई गतिविधियों की इजाज़त दे। इस बीच, कंपनी के कई सै

ब्रिटिश काल में भारतीय कारोबारियों का पहला संगठन कब बना?

माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 11/9/2021

स्वदेशी कपास उद्योग के पतन से हथकरघा उद्योग में काम करने वाले भारतीय कारीगर बड़ी संख्या में बेरोज़गार हुए। उनके पास भूमिहीन मज़दूरों के रूप में काम करने के अलावा विकल्प नहीं बचा। अंग्रेज बुनकरों को भी नुकसान हुआ। पर उन्हें लंकाशायर के मशीनी कपड़ा उद्योग में काम मिल गया। इस समय ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति चल रही थी। उसके असर में पूँजीवादी ताक़तें भारत पहुँच चुकी थीं। वे यहाँ व्यवसायी मध्यवर्ग को प्रोत्साहित कर रही थीं, जो आगे भारतीय उद्योग की नींव डालने वाला था। 

अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों ने भारतीय उद्योग धंधों को किस तरह प्रभावित किया?

माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 10/9/2021

तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हेस्टिंग्स ने 1815 में जब पूरे देश का दौरा किया तब उन्हें नहरी-संरचनाओं की अहमियत समझ आई। इससे जुड़े मुनाफ़ों का भी वे अनुमान लगा सके। हिंदुस्तान में 18वीं सदी की अराजकता ने इन संरचनाओं को काफ़ी नुक़सान पहुँचाया था। लिहाज़ा हेस्टिंग्स ने तुरंत सबसे पहले पश्चिमी यमुना नहर के पुनरुद्धार का काम शुरू करने का आदेश ज़ारी किया। हालाँकि शुरू में काम धीमा रहा। मगर जब 1823 में सिंचाई परियोजनाओं का काम देखने के लिए दिल्ली में एक महाअधीक्षक की नियुक्ति की गई, तब इस 445 मील लंबी नहर का काम तेजी से पूरा हो सका। फिर पूर्वी यमुना नहर का 1830 में पुनरुद्धार कराया गया। वैस

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