साल 2016 में एक फिल्म आई थी, ‘पिंक’। समाज में महिलाओं की व्यथा, उनकी पीड़ा, उनके संघर्ष को दिखाती एक कहानी। इसी फिल्म में एक कविता थी, ‘तू चल, तेरे वज़ूद की समय को भी तलाश है’। इन ख़ूबसूरत लब्ज़ों को अपनी कलम से कागज़ पर उतारा था, गीतकार तनवीर ग़ाज़ी ने। जबकि आवाज़ दी थी, हिन्दी सिनेमा के सबसे बड़े सितारे की हैसियत पा चुके अमिताभ बच्चन ने।
ये राजस्थान के एक गाँव का दृश्य है। सवेरा अभी हुआ नहीं है। बस होने को है। यह सूर्योदय से ठीक पहले की वेला है। मई का महीना है। लेकिन ‘ताऊ ते’ तूफ़ान का कुछ असर है। इससे बेख़बर कि इसने हज़ारों घर तबाह किए हैं और सैकड़ों जानें भी ली हैं। यहाँ दो दिन से लगातार बारिश हो रही है। इसलिए मई की बीती तारीख प्रदेश में 10 साल की सबसे कम गर्म रही। ये और बात है कि प्रदेश में अग्रणी और देश का नम्बर-एक अख़बार होने का दावा करने वाला समाचार पत्र मई को सबसे ठंडी कह देता है। अख़बार के पहले पन्ने पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखी यह बात पढ़कर मैं अपनी हँसी नहीं रोक पाती हूँ।
ये पहला वीडियो मध्य प्रदेश के भोपाल शहर के ‘आम शख़्स’ योगेश बलवानी का है। और दूसरा शहर के बड़े ‘ख़ास अस्पताल’ चिरायु के प्रबन्धक गौरव बजाज का। ये अस्पताल इतना ख़ास है कि जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके जैसे दूसरे बड़े सत्ताधारी विशिष्ट जन कोरोना संक्रमित होते हैं, तो यहीं का रुख़ करते हैं। फिर ठीक होकर लौटते भी हैं।
एक संतरा सामने है, एक सेवफ़ल, एक बड़ा सा पपीता, एक कीवी, कुछ बेर रखे हैं। मैं सोचता हूँ कि आज भोजन न करूँ। इन चीज़ों से अपनी क्षुधा मिटाऊँ। आम का मौसम नहीं है। इसलिए थाली से आम गायब है। केले बाजार में बहुतायत में है पर मुझे पसंद नहीं। उनकी तासीर मेरे जिस्म से मेल नही खाती। अमरूद मौसम में बहुत खाए और अब जामुन का इन्तज़ार है।
दिल्ली। साल 2021, मई का महीना, 10 तारीख। बीती रात बारिश हुई है। इसे बारिश कहना गलत होगा। बादलों ने धधकती दिल्ली के कलेजे पर थोड़ा पानी डालकर उन्हें ठंडा करने की कोशिश की है शायद। अख़बारों में मौसम, मानसून की ख़बरें एक या दो कॉलम में दिख जाती हैं। अभी सवेरे हवा चल रही है। हवा में ठंडक है। लेकिन ये हवा पहली बार कुछ अलग-सी महसूस हो रही है। गोया इसमें कोई चीत्कार समाया हो।
सामने एक मराठी परिवार था, जिसमें एक बुजुर्ग साथ रहते थे। बाद में मालूम पड़ा कि वे अकेले ही थे। जीवन संग्राम अकेले ही लड़ते रहे और अपना जीवन परिजनों के सुख के लिए समिधा बना दिया। एक कड़कती बरसात की रात में देह छोड़ गए। अगले दिन सुबह जब हम सब लोग भीगते हुए श्मशान पहुँचे। सूखी लकड़ियों पर देह रखी। लेकिन शाम तक वह जल नहीं पाई। आख़िर अधजली देह को छोड़कर आ गए। कहते हैं, जो जीवन में अकेले रह जाते हैं, उन्हें अन्तिम समय में जलाने से अग्नि देव भी मना कर देते हैं।
वक़्त मुश्किल है। एक अदृश्य दुश्मन (कोरोना) है, जिसने मानवता के ख़िलाफ़ जंग छेड़ रखी है। हमारे घरों में घुसकर हमारे अपनों को वह हमसे छीन रहा है। व्यवस्थाएँ पस्त हैं और अव्यवस्थाएँ मस्त। पूरा माहौल निराशाजनक है।
लेकिन वास्तव में यही हमारे लिए परीक्षा की घड़ी है। घनघोर निराशा के अन्धकार में भी हमें अपने आप पर यक़ीन करना होगा। ईश्वर पर भरोसा रखना होगा। ये मानना होगा कि जल्द ही सब ठीक हो जाएगा। उम्मीद का दीया जलाए रखना होगा।
बात तो पुरानी है, लेकिन आजकल फिर से यही वाक्य सुनने को मिल रहा है तो याद आ गई। और मैं डायरी के पन्ने पर उतारने बैठ गया।
दरअसल, बात उन दिनों की है, जब मैं पार्ट टाइम नौकरी ढूँढ़ रहा था। जहाँ भी जाता, बात होती और सामने से जवाब मिलता, "We will let you know. (हम बताते हैं)" इस तरह, धीरे-धीरे यह वाक्य कुछ दिनों के लिए ज़िन्दगी का हिस्सा बन गया।
कल दीपक शर्मा जी की 23 तारीख की डायरी पढ़ी। निश्चित रूप से वाराणसी की घटना समेत पूरे देश की समस्या दुखद है। किन्तु इसके लिए केवल राजा ही नहीं बल्कि उसकी प्रजा भी उतनी ही ज़िम्मेदार है।
ऊपर फोटो पत्रकार मित्र ज्ञान त्रिपाठी की तस्वीर अपने आप सारी कहानी कह देती है। हम समय रहते भी नहीं चेते। यह तस्वीर तो शिक्षित समाज की है। बाकी देश का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है। गाँवों के हालात के बारे में टुकड़ों में लगातार सोशल मीडिया पर बातें सामने आ रही हैं।
डायरी के इस पन्ने पर पड़ी तारीख अपने आप में सारी कहानी कहती है। यह ऐसी तारीख है, जब देश में कोरोना के मामले पहली बार सारे आँकड़ों को पार कर गए हैं। पिछले साल इन्हीं दिनों अमेरिका बिलबिला उठा था। यह वह समय था जब वहाँ एक दिन में तीन लाख मामले सामने आए थे।
अब हमारे यहाँ हालात उस महाशक्ति से भी बदतर हो गए हैं। अभी दो दिन पहले यानी 21 तारीख को देश में 24 घंटे में पहली बार तीन लाख 14 हजार नए मामले सामने आए। ये कल के अख़बारों का शीर्षक था।