लॉर्ड मेयो 1869-72 तक भारत के वायसराय थे। उन्होंने ब्रिटेन की सरकार को एक पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने लिखा, “दुनिया में भारत जैसा शायद ही कोई देश हो, जहाँ सरकार का कृषि के क्षेत्र से ऐसा सीधा हित जुड़ा हो। भारत सरकार सिर्फ ‘सरकार’ नहीं है, वह मुख्य ज़मींदार भी है। सरकार को जिस संपत्ति के लगान के रूप में बड़ा राजस्व मिलता है, वह किसी निजी मालिक की नहीं, सरकारी है। ऐसे में पूरे देश में कृषि के हालात सुधारने के लिए कदम उठाने पर सरकार और उसकी संपत्ति की अहमियत बढ़ती है। इसीलिए इंग्लैंड में जो काम बड़े जमींदार करते हैं, भारत
भगवान बुद्ध अपने अन्तिम उपदेश में बड़ी कठोर बात करते हैं। हालाँकि अभी तक हम बुद्ध को जहाँ भी देखते हैं हमेशा सौम्य, शान्त, सहज दिखाई देते हैं। लेकिन अन्तिम उपदेश के समय बुद्ध कठोर हो उठते हैं। सदा क्षमा करने वाले बुद्ध दंड देने की बात कहते हैं।
दरअसल, हर किसी को क्षमा करना सम्भव भी नहीं। बुद्ध सौम्य हैं। लेकिन व्यवहारिक भी हैं। बुद्ध केवल श्रद्धा की बात करते तो अपने उपदेश कैसे करते? श्रद्धा रहती तो प्राचीन सिद्धान्तों को यथावत् ही न मान लेते? अपने नए व्यवहारिक उपदेशों की आवश्यकता ही क्या थी?
दिसंबर-1858 में ब्रिटेन के तत्कालीन गृह मंत्री ने निर्देश दिया कि जो लोग “खाली पड़ी जमीनों पर कपास या निर्यात करने लायक अन्य उत्पाद की खेती करना चाहते हैं, उन्हें भारत सरकार जमीन उपलब्ध कराने पर विचार करे। इससे ब्रिटेन को कच्चे माल की अधिक आपूर्ति में हो सकेगी।” इसके बाद ऐसी अधिकांश जमीन सरकार की ओर से बाग़ानों के लिए उपलब्ध करा दी गई। गृह मंत्री के निर्देश में स्पष्ट था कि ऐसी जमीन सिर्फ़ यूरोपीय समुदाय के लोगों को उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहना है। यह निर्देश भारत सरकार के लिए तब काम आया, जब उसने 1871 में खाली जमीन लोगों को उपलब्ध कराने संबंधी नियम बनाए। इन नियमों के मुत
मैकॉले ने ब्रिटिश-भारत में कानून का राज स्थापित करने के लिए बड़े क्रांतिकारी सुधार सुझाए थे। उनका दृष्टिकोण भी सिर्फ कानूनी ढाँचे और न्यायिक प्रशासन तक सीमित नहीं था। उदाहरण के लिए उन्होंने दिसंबर 1835 में एक समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा था। इस समिति को जेलों से संबंधित मामले और वहाँ के अनुशासन आदि की जाँच का जिम्मा सौंपा जाना था। इसके पीछे उनका तर्क था, “सबसे अच्छी आपराधिक दंड संहिता भी तब तक अल्प-उपयोगी ही है, जब तक कि सज़ा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी मशीनरी न हो।” सो, उनके सुझाव पर यह समिति बनी भी, लेकिन गृह विभाग ने 1838 में आई इसकी रिपोर्ट को ख़ारिज़ कर दिया। दलील दी कि “इसे लागू करने
भारत सरकार अधिनियम-1919 में प्रावधान था कि हर 10 साल में इसकी समीक्षा होगी। इसी के मुताबिक 1927 में एक आयोग बना, जो नवंबर में भारत पहुँचा। ब्रिटिश सरकार ने इसे सोच-समझकर दो साल पहले गठित किया। कारण कि ब्रिटेन में 1929 में चुनाव होने थे। उसमें लेबर पार्टी के जीतने की संभावना थी। लेबर पार्टी भारत को ‘स्वराज का अधिकार’ देने की पक्षधर थी। लिहाज़ा तत्कालीन रूढ़िवादी सरकार के गृह मंत्री ने लॉर्ड बिरकेनहैड ने आयोग के ज़रिए संदेश देने की कि वे भी भारत के पक्ष में सोच रहे हैं। जबकि इन्हीं बिरकेनहैड ने ब्रिटिश संसद में 1919 के सुधारों का विरोध किया था। बहरहाल, नए आयोग के गठन का समर्थन
दिसंबर 1916 में इंग्लैंड में रुढ़िवादियों की सरकार बनी। लेकिन प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज उदारवादी थे। उन्होंने अगले साल जुलाई में एडविन मॉन्टेग्यू को गृह मंत्रालय में भारत से जुड़े मामले देखने के लिए, खास तौर पर तैनात किया। वे भी उदारवादी थे। उन्होंने 20 अगस्त 1917 को संसद के निचले सदन ‘हाउस ऑफ कॉमंस’ में घोषणा की, “भारत के संबंध में हमारी सरकार की नीति ये है कि शासन-प्रशासन की सभी शाखाओं में भारतीयों को ज्यादा से ज्यादा सहभागी बनाया जाए। भारत की स्वशासी संस्थाओं का विकास किया जाए। भारत की उत्तरदायी सरकार ब्रिटिश साम्राज्य अविभाज्य हिस्सा है। लिहाज़ा इस दिशा में जो कदम ज़रूरी है
ब्रिटेन में 1906 में बनी उदारवादी सरकार मानती थी कि भारतीयों की माँगों का समाधान करना होगा। इसलिए उसने तय किया कि भारत में अप्रत्यक्ष शासन की व्यवस्था करनी चाहिए। तब ब्रिटेन में गृह मंत्री जॉन मॉरले थे। इधर भारत में लॉर्ड मिंटो (1905-1910) वायसराय बन चुके थे। मिंटो मानते थे कि सिर्फ़ भारतीय मध्यम वर्ग की भावनाओं/इच्छाओं का ख्याल रखते हुए बदलाव नहीं करने चाहिए। भारतीय राजा-महाराजाओं की परिषद भी गठित करनी चाहिए। ताकि कांग्रेस से अलग राय भी सरकार को मिले। उधर, मॉरले के दिमाग में यह बिलकुल नहीं था कि अभी भारत में ब्रिटेन की तरह संसदीय संस्थाएँ होनी चाहिए। लिहाज़ा, 1909 में जब
साल 1905 में अंग्रेजी सरकार ने बंगाल का विभाजन कर दिया। इसका मक़सद बताया, प्रशासन की कार्यकुशलता बढ़ाना। लेकिन इससे भारतीय शिक्षित वर्ग में संदेश गया कि सरकार उनके विचारों की अनदेखी का इरादा रखती है। इस बारे में सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने लिखा था, “हमें लगता हैं, जैसे हमारा पूरा भविष्य दाँव पर है। बंगालीभाषी समाज के लिए बढ़ते समर्थन और उसमें बढ़ती आत्म-चेतना, व्याकुलता के मद्देनज़र जानबूझकर आघात किया जा रहा है।” उस दौर में एक पूर्व नौकरशाह थे, रोमेश चंद्र दत्त। साल 1900 के आसपास वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे। उन्होंने तब वायसराय लॉर्ड कर्जन को खुले आलोचनात्मक
हम मसख़रों पर हँस सकते हैं, लेकिन उनकी अवहेलना नहीं कर सकते। क्योंकि इसका मतलब होगा, देश की पूरी राजनीति और लोकतंत्र को ख़तरे में डाल देना। याद रखें, उन्हें लोकतंत्र को गाहे-बगाहे ख़तरे में डालने का अधिकार है, हमें नहीं। तो हम क्या करें?
एक मसख़रे से बात ही कर लेते हैं।
आप मसख़रे होकर भी राजनीति में हैं?
जब भी बुद्ध को पढ़ता हूँ तो पाता हूँ, आधुनिक भारत के बौद्ध व्याख्याकारों और बौद्धधर्मियों ने बुद्ध को सनातन के विरुद्ध खड़ा कर दिया है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ भारतीय भूमि से जन्मा बुद्ध धर्म धीरे-धीरे अपनी ही धरती से अलग हो गया। जबकि बुद्ध तो मूल रूप से सनातन के अतिकर्मकांडो की श्रृंखलाओं के परिहार के लिए खड़े हुए थे, बस।