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हादसे के जिम्मेदारों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए थी, जो मिसाल बनती, लेकिन...

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 7/12/2021

फैसला सामने आते ही दोपहर बाद दिल्ली से लेकर भोपाल तक जानकारों की प्रतिक्रियाएं आने लगीं… 

25 साल (अब 37) से गैस त्रासदी के मामले से या तो बेखवर या तमाशे की तरह देख रहे नेताओं ने घड़ियाली आंसू बहाए। जांच एजेंसियों ने सरकारी किस्म के बयान दिए। गैस पीड़ित संगठनों ने अफसोस जताने की रस्म अदायगी की। 

फैसला आते ही आरोपियों को जमानत और पिछले दरवाज़े से रिहाई

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 5/12/2021

हादसे के बाद सात दिसंबर 1984 को एंडरसन भोपाल आया था। हनुमानगंज थाना पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया। वह 25 हजार के मुचलके पर रिहा कर दिया गया। मुचलके की भाषा गोखले ने एंडरसन को पढ़कर सुनाई थी। इसके बाद एंडरसन ने उस पर दस्तखत किए थे। फिर उसे सरकारी विमान से दिल्ली रवाना कर दिया गया। 25 साल (अब 37) बीत गए हैं। इस बीच दुनिया बदल चुकी है। लेकिन हादसे के पीड़ितों के लिए वक्त वहीं ठहर गया। जिंदगी एक बोझ बन गई, जिसे वे अब तक ढो रहे हैं।…

फैसला, जिसमें देर भी गजब की और अंधेर भी जबर्दस्त!

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 4/12/2021

…भोपाल के लिए आज का दिन कुछ खास है। राजधानी की नई जिला अदालत से आज एक खास फैसला आने वाला है। एक ऐसा फैसला जिसमें देर भी गजब की है और अंधेर भी जबर्दस्त। यह 25 साल पुरानी भोपाल की भयानक गैस त्रासदी का मामला है, जिस पर दुनिया भर की निगाहें हैं। मीडिया खासतौर से उत्साहित है।…चीफ ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट (सीजेएम) मोहन पी. तिवारी के कोर्ट रूम से आने वाली खबरों का सबको बेसब्री से इंतजार है। वे ही फैसला सुनाने वाले हैं।

गैस त्रासदी...जिसने लोकतंत्र के तीनों स्तंभों को सरे बाजार नंगा किया!

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 3/12/2021

‘भोपाल गैस त्रासदी : आधी रात का सच’, यह ऐसी कहानी है, जिसमें एक अदालती फैसले के सिवाय नया कुछ नहीं है। भोपाल में ज्यादातर तथ्य पहले से सब जानते हैं। लेकिन हादसे के बाद बीते इन (37) सालों में देश में एक नई पीढ़ी तैयार हुई है। उसे शायद ही हादसे की सच्चाइयाँ मालूम हों। शायद उसकी कोई दिलचस्पी भी न हो। जबकि उन्हें पता होना चाहिए कि जिस व्यवस्था में वे जिंदगी गुजारने वाले हैं, वह कैसी है? सत्ताधीशों को क्या करना चाहिए और करते क्या हैं? खासतौर से तब जब एक शहर ने हजारों लाश को सड़कों पर कीड़े-मकोड़ों की तरह पड़ा देखा हो। ऐसे कठिन समय में उनसे क्या उम्मीद की जानी चाहिए?

जाे जिनेन्द्र कहे गए, वे कौन लोग हैं और क्यों?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 30/11/2021

इन्द्रियों को जीत लिया है जिस व्यक्ति ने, वह जिन या जिनेन्द्र आदि विशेषणों से पुकारा जाता है। भारतीय धर्म-दर्शन इन्द्रियों पर विजय पाने की महत्त्वपूर्ण चर्चा करता है। प्रत्येक महर्षि, प्रत्येक महात्मा जितेन्द्रिय होने का उपदेश देते हैं। कठोपनिषद में ऋषि कहते हैं कि इन्द्रिय आदि का संयुक्त रूप यह शरीर मैं नहीं हूँ। इससे अलग विलक्षण नित्य चेतना हूँ। जो ऐसा जान लेता है, वह व्यक्ति सदा के लिए दुःख से रहित हो जाता है। 

कब अहिंसा भी परपीड़न का कारण बनती है?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 23/11/2021

प्राचीन काल की बात है। किसी गाँव में चन्द्रभूषण नामक एक विद्वान पंडित रहते थे। उनकी वाणी में गज़ब का आकर्षण था। भागवत् कथा सुनाने में निपुण थे। उनकी वाणी से कथा सुनकर लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे। इसीलिए उनके घर रोज कथा सुनने वालों की भीड़ लगी रहती। दूर-दूर से लोग चन्द्रभूषण से कथा सुनाते थे। उसी गाँव में दूसरे पंडित जी रहते थे। उनका नाम था, नंबियार। पढ़े-लिखे तो वे बहुत थे। लेकिन थोड़े घमंडी स्वभाव के थे। स्वयं को बहुत बड़ा विद्वान भी समझते थे। सोचते कहाँ कल का यह बच्चा चन्द्रभूषण, जो अटक-अटक कर कथा पढ़ता है और कहाँ मैं शास्त्रों क

सोचिए कि जो हुआ, जो कहा, जो जाना, क्या वही अंतिम सत्य है

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 16/11/2021

तैत्तिरीय उनिषद् में एक प्रसंग है। ऋषि भृगु और उनके पिता का। ऋषि भृगु अपने पिता वरुण के पास जाते हैं और पूछते हैं, परमात्मा कैसा है? वरुण कुछ विचारमग्न होकर पुत्र को देखने लगते हैं। और भृगु उस परमात्मा को पाने की उत्कट अभिलाषा व्यक्त कर देते हैं।

जो क्षमा करे वो महावीर, जो क्षमा सिखाए वो महावीर...

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 9/11/2021

एक सेठ ने अपने छोटे भाई को व्यापार शुरू करने के लिए कुछ धन दिया। लेकिन छोटे भाई ने व्यापार जमने के बाद धन वापस नहीं किया। धीरे-धीरे धन के कारण दोनों भाइयों में विवाद गहरा होता चला गया। दोनों में बातचीत बन्द हो गई। कई वर्ष बीत गए। 

सेठ का मन हमेशा इस बात से व्यथित रहता। किसी दिन सेठ ने एक महत्मा से अपनी व्यथा-कथा सुनाई। महात्मा ने कहा, “आप अपने भाई से क्षमा माँग लीजिए। आपकी व्यथा दूर हो जाएगी।” 

इस पर सेठ कहने लगे, “मैं क्यों क्षमा माँगूं?’ 

वीर सावरकर की हिन्दु महासभा के उद्देश्य क्या बताए गए थे?

माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 30/10/2021

सुभाष चंद्र बोस के विचारों और कार्यों ने भारत में तमाम युवाओं को प्रेरित किया। इन्हीं में एक अग्रणी नाम था विनायक दामोदर सावरकर (1883-1965) का। वे भी क्रांति के पथ पर चलते हुए भारत से अंग्रेजी सरकार को उखाड़ फेंकने का मंसूबा पाले थे। उन्होंने 1919 में अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ‘हिंदु महासभा’ की स्थापना की। इस संगठन की छवि मुसलिम विरोधी बन गई थी क्योंकि यह भारतीय मुसलमानों को हिंदु धर्म में वापस लाने के लिए सक्रिय था। हालाँकि इसके कार्यक्रमों में दूसरा पहलू भी दिखता है।

महात्मा गाँधी को संत और राजनेता का असहज मिश्रण क्यों कहा जाता था?

माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 30/10/2021

बंगाल के विभाजन के ख़िलाफ़ हुआ आंदोलन वैसे तो राष्ट्रीय स्वरूप का था, फिर भी कुछ मुसलमानों ने इसका विरोध किया। इसे हिंदुओं की प्रतिक्रिया माना। ख़ास तौर पर मुसलिम आबादी की प्रतिक्रिया इस आंदोलन के विरुद्ध तीखी थी। उस पृष्ठभूमि में रूढ़िवादी मुसलिमों को प्रेरित किया कि कांग्रेस का मुकाबला करने के लिए उन्हें भी राजनीतिक संगठन बनाना चाहिए। इस समय तक आज़ादी के आंदोलन का नेतृत्व पूरी तरह कांग्रेस के हाथ में आ चुका था। साथ ही उसके बारे में यह राय भी बनने लगी थी कि उसके संगठन पर अतिवादी नेता हावी हो गए हैं। लिहाज़ा अल्पसंख्यक मुसलिम प्रतिक्रि

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