धार्मिक राष्ट्रवाद के प्रति वैसे, मध्यम वर्ग के उन सदस्यों में आकर्षण कम था जो कांग्रेस सदस्य तो थे ही, 1892 के परिषद-अधिनियम के बाद विधान परिषदों में भी चुने गए थे। इनमें अधिकांश डॉक्टर, वकील, स्कूल-शिक्षक, व्यापारी आदि थे। इन लोगों को सामान्यत: किसानों और उनकी परेशानियों से भी कम ही सहानुभूति थी। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि आज़ादी के आंदोलन के दौरान उदारवादी नेताओं का एक बड़ा वर्ग कानूनी पेशे से आया था। ज़ाहिर तौर पर उनके मन में कानून के प्रति सम्मान था। लिहाज़ा वे वैधानिक माध्यमों और प्रक्रिया से ही अंग्रेजों पर आज़ादी के लिए दबाव बनाने के पक्षधर थे
हिंदु राष्ट्रवाद का बीज भी बंगाल में ही पहली बार पड़ा था। वहाँ बंकिम चंद्र चटर्जी जैसे नेताओं और उनके कार्यों ने इसे खूब उत्प्रेरित किया। बंकिम चंद्र 1858 नए-नए स्थापित कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक करने वाले शुरुआती दो छात्रों में से एक थे। फिर 1891 तक नागरिक (सिविल) सेवा में रहे। लेकिन चूँकि भारतीयों के लिए अब तक सरकारी सेवा में विकल्प सीमित थे, इसलिए उन्हें उप-कलेक्टर (डिप्टी कलेक्टर-मजिस्ट्रेट) ही नियुक्त किया गया। उनकी पदोन्नति नहीं हुई। इस पद से वे सेवानिवृत्त हुए।
ऐसा दावा किया जाता है कि ह्यूम ने सरकार के अभिलेखागार में देशभर से आईं ख़ुफ़िया रपटों को देखा-पढ़ा था। ये रपटें कानून-व्यवस्था की असहज स्थितियों से जुड़ीं थीं। उन्हें पढ़ने के ह्यूम ने अपनी ‘सेफ्टी वॉल्व’ योजना का विस्तृत दस्तावेज तैयार किया था। इसमें एक जगह लिखा है, “पहले तो हमने यही नहीं माना था कि हमारी सरकार के ख़िलाफ़ कुछ सालों बाद ही विद्रोह हो जाएगा। जो भविष्यवाणी की भी गईं, वह छिटपुट अपराधों की थी। हत्या जैसी हिंसक वारदातों, बैंकों से जुड़े कर्मचारियों और बाज़ारों की लूट आदि का अनुमान था। यह माना गया था कि
वैसे, राष्ट्रवाद की पहल भी बंगाल से ही हुई। यहाँ ‘ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन’ एक आभिजात्य वर्ग-केंद्रित संगठन था। इसे माध्यम वर्ग ने अपने हितों की अभिव्यक्ति के लिए अनुपयुक्त समझा। लिहाज़ा कुछ बंगालियों ने मिलकर 1875 में नया संगठन, ‘इंडिया लीग’। इसका उद्देश्य “लोगों के विचार का पता लगाना और उसका प्रचार करना था कि देशवासियों के अनुसार भारतीय राजनीतिक और अन्य क्षेत्रों में कैसे प्रगति कर सकते हैं। उन साधनों पर चर्चा करना और उन्हें अपनाना था, जिन्हें देशवासियों की भलाई के लिए और उनके बीच राजनीतिक शिक्षा के प्रसार के लिए उच
विद्रोह के बाद ब्रिटिश ताज ने जब भारत का शासन अपने हाथ में लिया, तो महारानी विक्टोरिया ने एक घोषणा पत्र जारी किया। इसमें भारतीयों से वादा किया गया कि सार्वजनिक सेवा में उनके साथ भेदभाव नहीं होगा। जबकि वास्तविकता ये थी कि अंग्रेज विशुद्ध रूप से नस्लीय आधार पर भारतीयों से भेदभाव करते रहे। उन्होंने नई परिषदों में जिन भारतीयों को शुरू में मनोनीत किया, वे अधिकांश पुराने शासक वर्ग के प्रतिनिधि थे। वे उन लोगों में नहीं थे, जिनके बारे में मैकॉले का पूर्वानुमान था कि ‘रंग और खून में भारतीय लेकिन पसंद, विचार, नैतिकता और बौद्धि
अंग्रेजी शासन के दौर में चूँकि कोई भारतीय भाषा देश में समान रूप से मान्य नहीं थी, इसलिए बुद्धिजीवियों के लिए अंग्रेजी संवाद का मुख्य माध्यम बन चुकी थी। यह 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में अंग्रेजी भाषा की पत्रिकाओं की संख्या बढ़ाने वाला बड़ा कारण रहा। तब राष्ट्रवाद भी उभार पर था। उसकी पृष्ठभूमि में भारतीयों के मालिकाने वाले कई अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र भी अस्तित्व में आए। भाषा के साथ चूँकि राष्ट्रवाद का विचार भी अंग्रेजी ही था, इसलिए दोनों को ही तमाम भारतीय सहजता और प्रवाह से बरत रहे थे।
साल 1890 तक ब्रिटिश संरक्षकों के लिए भारतीय चित्रकला भी बेमानी हो चुकी थी। उसे भारतीयों का भी विशेष संरक्षण नहीं मिल रहा था। संरक्षण के अभाव में पारंपरिक भारतीय चित्रकला केवल कुछ मूल प्रांतों में ही बची थी। हालाँकि इस दौर में भी कम से कम एक भारतीय कलाकार (राजा रवि वर्मा) ने तैलीय-चित्रकारी की कूची थाम रखी थी। उन्होंने पश्चिमी शैली में चित्रकारी करना शुरू की। बड़ी संख्या में राजकुमारों और अफ़सरों के चित्र बनाए। इनमें बॉम्बे के राज्यपाल (1879) का भी एक चित्र था। यद्यपि अंग्रेजों को अब भारतीय चि
भारतीय समाज-सुधारकों में अगला नाम दयानंद सरस्वती का उल्लेखनीय है। उन्होंने सभी धार्मिक-अवधारणाओं को ख़ारिज़ कर दिया। सुधारों के लिए अतीत में झाँका तो उन्हें समाधान वेदों में मिले। इसके बाद उन्होंने स्थापित किया कि वेदों को छोड़कर कोई धर्मग्रंथ प्रमाण नहीं है। यहाँ तक कि पश्चिमी विज्ञान के बीज भी भारतीय वेदों में हैं। भाप के इंजन, जहाज और रेल प्रणाली का मूल भी उन्होंने किसी न किसी रूप में वेदों में ही पाया। उन्होंने 1875 में अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए आर्य समाज की स्थापना की। आर्य समाज ने सभी जातियों को व
सन् 1857 की क्रांति के बाद भारतीय अधिक संख्या में समाज सुधार कार्यक्रमों की माँग करने लगे थे। हालाँकि यह माँग भारतीय समाज सुधारकों से ही थी। इस पृष्ठभूमि में राजा राममोहन रॉय द्वारा स्थापित ‘ब्रह्म समाज’ के बड़े नेता देबेंद्रनाथ टैगोर क्रमिक सुधार के पक्षधर थे। उन्होंने 1867 में लिखा था, “हमें हिंदु शास्त्रों में वर्णित ज्ञान के आलोक में अपनी परंपराओं, रीति-रिवाज़ों, समारोहों का शुद्धिकरण करना है। लेकिन यह सावधानी भी बरतनी है कि सामाजिक बदलाव की गति बहुत तेज न हो। नहीं तो हम उसी वर्ग से अलग हो जाएँगे, जिसका हमें उन्नयन करना है।” लेकिन ‘ब्रह्म समाज’ के युवा कार्यकर्ता इस दृष
उस समय एक मिशनरी थे विलियम एडम। उन्होंने सरकार के कहने पर बंगाल और बिहार में शिक्षा की स्थिति पर कई रपटें तैयार की थीं। उन्होंने 1835 में महिलाओं की शिक्षा के मामले में कहा था, “विशुद्ध और असहाय अज्ञानता की स्थिति है।” उनके मुताबिक हिंदु महिलाओं में अंधविश्वास था कि जो लड़की पढ़ना-लिखना सीख जाएगी, वह शादी के तुरंत बाद विधवा हो जाएगी। इस अंधविश्वास को “पुरुषों ने हतोत्साहित भी नहीं किया।” अधिकांश पुरुषों का मानना था कि महिलाओं की जगह घर के भीतर है। उन्हें सिर्फ़ घरेलू अर्थव्यवस्था से जुड़ी शिक्षा की ज़रूरत है। वह घर में ही मिलनी चाहिए।