आज के बुलेटिन में जानिएः
इन सवालों के बारे में जानते हैं देवांशी से....
वाक़या जितना रोचक है, उतना सोचक भी। आज सुबह-सुबह काम करने के लिए जैसे ही कंप्यूटर खोला, उसमें दाहिनी तरफ से विज्ञापनों के नोटिफिकेशंस (Notificatoions) की जैसे बमबारी होने लगी। हर आधे-एक मिनट में एक ‘टुन्न’, फिर ‘टुन्न’। मतजब ऐसा कि आधे घंटे में भी दिमाग झन्ना गया। बीते रोज कंप्यूटर बन्द करते समय कहीं कोई अनदेखी हो गई होगी, जिसका नतीज़ा इस तरह सामने आ रहा था। चूँकि अपना कंप्यूटर का ज्ञान कामचलाऊ स्तर का ही है, इसलिए बहुत देर तक तो सूझा ही नहीं कि ये नोटिफिकेशंस आख़िर आ क्यों रहे हैं? और इन्हें बन्द कैसे किया जाए?
तत्कालीन गृह सचिव कृपाशंकर शर्मा : मुझे सीएस ने कुछ नहीं बताया
• एंडरसन को बचाने में कौन किसके दबाव में था? कलेक्टर ने कहा कि सीएस ने कहा था?
→यदि सीएस ने ऐसा कहा तो सीएम की मर्जी से ही किया होगा। वैसे अर्जुनसिंह की कार्यशैली ऐसी नहीं थी कि वे एंडरसन जैसे अहम मामले में सिर्फ सीएस को कहकर फारिग हो जाते। उन्होंने सीएस के साथ कलेक्टर और एसपी को बुलाकर सीधी बात की होगी। ताकि ऊपर से नीचे तक यह स्पष्ट हो कि हुक्म किसका है? मैं तो कहता हूं कि भोपाल के उस वक्त के हालात के मद्देनजर उस वक्त ये अधिकारी ऐसा हुक्म मानने से इंकार कर सकते थे।
धन कमाने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति प्रायः अपने पक्ष में यह कहता है कि ‘सर्वे गुणाः काञ्चनम् आश्रयन्ति’ यानि सभी गुण धन के आश्रय से ही फलते-फूलते हैं। इसीलिए हर कोई करोड़पति बनना चाहता है। लेकिन कैसे बनना है? यह प्रश्न दिमाग में आते ही उत्तर भी आता है, कैसे भी। यह ‘कैसे भी’ आश्चर्यजनक उत्तर है। क्योंकि इसमें मार्ग क्या हो, इसका महत्त्व नहीं रह जाता। रह जाता है, केवल धन कमाकर ‘धनपशु’ बन जाना।
आवाजों का शोर है। इधर जीवन में एक और आवाज़ जुड़ी है, ठन- ठन-ठन, चौबीसों घण्टे गूँज रही है। हर समय सोते-जागते, यह आवाज़ पीछा नही छोड़ रही, छाती को फाड़कर, गले को चीरकर निकल रही है।
हम तय वक्त पर मोतीसिंह के घर पहुंचे। दुआ-सलाम से ही लग गया कि वे तेल चुपड़े पहलवान की तरह सामने विराजित हैं, जो यह तय करके बैठे थे कि पकड़ में नहीं आना है। इसलिए दिसंबर 1984 के किसी भी सवाल पर उनका रटा रटाया सा जवाब मिलता-'नो कमेंट।’ कोई और बात कीजिए। उन्होंने कहा कि इस मीटिंग के पहले हम तय कर चुके हैं कि इस बारे में कोई बात नहीं होगी। यह समय गुजर जाने दीजिए फिर इत्मीनान से इस बारे में बात होगी। हादसे से जुड़े हर सवाल पर वे एक और बात दोहराते गए, 'मेरी किताब पढ़िए। उसमें मैंने सब कुछ लिख दिया है। आपके हर सवाल का जवाब मेरी किताब में है। '
कक्षा छठवीं की संस्कृत की पाठ्यपुस्तक में एक श्लोक है,
“सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः। सत्येन वाति वायुश्च, सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्।।”
भावार्थ है कि सत्य के कारण पृथ्वी स्थिर है। सत्य के कारण सूर्य अपनी ऊष्मा प्रदान करता है। सत्य के कारण वायु बहती है। इस संसार में सब कुछ सत्य से ही प्रतिष्ठित है।
मध्यप्रदेश में अर्जुनसिंह को एक रहमदिल और मददगार नेता मानने वाले मीडिया में भी कम नहीं हैं। कई वरिष्ठ साथी अपने अनुभव से उदाहरण भी गिनाते हैं। किसी गरीब की बेटी की शादी का प्रसंग हो, किसी जरूरतमंद को नौकरी की दरकार हो या किसी बीमार आदमी को इलाज की जरूरत। ऐसे नितांत निजी मामलों की जानकारी मिलते ही वे बतौर मुख्यमंत्री खुद दिलचस्पी लेकर फौरन मदद दिलाने में कभी पीछे नहीं रहते थे। ऐसे अनगिनत किस्से लोगों को याद हैं कि उन्होंने किस-किस तरह से लोगों को वक्त जरूरत मदद दिलाई। लेकिन उनकी छवि का यह उजला और प्रेरक पहलू उस तस्वीर से कतई मेल नहीं खाता, जो गैस हादसे में दुनिया के सामने आई। उन जैसे मानवीय
आज के बुलेटिन में जानिए :
आज के बुलेटिन में जानिएः
तस्वीर राजस्ठान के जैसलमेर की है। राजस्थान डायरेक्ट से साभार।