कहने को तो यह एक बोध-कथा है। लेकिन गौर करें तो सम-बोधकथा सी लगेगी। ऐसी जो समान रूप से हमारी भावनाओं, संवेदनाओं को सम्बोधित करती है। सीधे हमको हमसे रू-ब-रू कराती है। हमें बताती है कि हमारी रोजमर्रा की आपाधापी अगर हमसे कोई चूक हो रही है तो वह कहाँ? और उसे अगर हम सुधारना चाहें तो वह कैसे? इसीलिए सुनने लायक बन पड़ी है। एक बार ही नहीं कई बार, बार-बार।
कुछ अच्छी चीजें हमारे अभ्यास में आ जाएँ, उसके लिए यही एक तरीका भी तो है... बार-बार उनसे दो-चार होते रहना!
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परलोक और पुनर्जन्म- दो ऐसी बातें हैं, जिनके बिना धर्म की गहनता को समझना सम्भव नहीं है। विज्ञान या तर्क से इसे न तो साबित कर सकते हैं और न ही ख़ारिज़। विज्ञान हालाँकि मानता है कि पदार्थ और ऊर्जा न पैदा होते हैं, न नष्ट। उनका बस रूपान्तरण होता रहता है। वह ये भी मानता है कि विचार, मनोभाव, विश्वास आदि के साथ मानव शरीर ऊर्जा की प्रक्रिया मात्र है। मानव ऊर्जा क्षेत्र के प्रयोगों में यह देखा जा सकता है।
अभी तीन रोज पहले सवेरे से ही फेसबुक के ज़रिए मिली एक ख़बर ने बड़ा बेचैन कर रखा था। आजकल ख़बरें अख़बार से बाद में, फेसबुक और ट्विटर से पहले मिलती हैं। अख़बार तो वैसे भी कोरोना-काल में अपन ने बन्द ही कर रखा है। इसलिए ई-पेपर पढ़ने के लिए मोबाइल सबसे सुविधाजनक बन पड़ता है। जहाँ मर्जी ले जाओ। चाहे तो शौचालय में भी।
शरद पूर्णिमा पर भगवान कृष्ण को खीर का भोग लगाना। वृन्दावन की गोपियों के साथ उनके महारास को याद करना। उन्हें नौका विहार कराना। ये सब साल-दर-साल होता आया है। पर क्या कभी इस अवसर पर भगवान शिव की स्तुति के बारे में सोचा गया? शायद नहीं। या सोचा भी गया होगा तो बहुत कम। भाेपाल, मध्य प्रदेश से वैष्णवी द्विवेदी ने यह सोचा है। शरद पूर्णिमा का उत्सव और शिव की स्तुति। शरद-शिव-स्तुति-उत्सव। भरतनाट्यम के माध्यम से।
नानाजी देशमुख ने अगर अपने सहयोगी डॉक्टर भरत पाठक जी को शरदोत्सव के तौर पर अपनी जयन्ती मनाने की सहमति दी तो वह यूँ ही नहीं थी। उसके पीछे उनका ख़ास मक़सद था। मन्तव्य था और इसकी भूमिका भी उनके मन-मस्तिष्क में काफी पहले बन चुकी थी। मुझे याद है, जब नानाजी ने बुन्देलखंड को अपना कार्यस्थल बनाया तो उनके मन में इस क्षेत्र के बारे में जानने की बड़ी उत्सुकता थी। यहाँ की संस्कृति, यहाँ का साहित्य, संगीत, आदि हर चीज में वे रुचि दिखा रहे थे। यह बात 1990 के दशक की शुरुआत की है। तब चित्रकूट में ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की नींव तैयार हो रही थी। उसी दौरान 18,19,20 नवम्बर 1991 को चित्रक
महाराष्ट्र के कडोली गाँव (हिंगोली जिला) में 11 अक्टूबर 1916 को जब नानाजी देशमुख का जन्म हुआ, उस दिन शरद पूर्णिमा थी। कहा जाता है, शरद पूर्णिमा को चन्द्रमा अपनी सोलह कलाओं से विभूषित होता है। पूर्णता को प्राप्त होता है और अपने इस रूप में वह पूरी सृष्टि में अमृत बाँटता है। यह निश्चित रूप से इस तिथि का ही संयोग था कि नानाजी देशमुख का व्यक्तित्तव भी समय के साथ विविध कलाओं (गुणों) से विभूषित हुआ। समय के साथ-साथ पूर्णिमा के चाँद की तरह पूर्णता को प्राप्त होता गया और फिर पूरे समाज को उन्होंने सेवा का अमृत बाँटा।
विजयादशमी, यानि विजय के उद्घोष का दिन। ये उद्घोष अगर ‘शक्ति का, शक्ति द्वारा और शक्ति के लिए’ हो तो? प्रश्न जितना ‘रोचक’ (Interesting) है, उतना ही ‘सोचक’ (Thinkable) भी। और इसका उत्तर ‘द मिस्टिक बैम्बू अकादमी’ के इस वीडियो में है।
इस वीडियो में ‘राग दुर्गा’ सुनाई दे रहा है। दुर्गा यानि शक्ति, जिसकी पूरे देश ने अभी नौ दिनों तक साधना, आराधना की। इस तरह ये ‘शक्ति का नाद’ हुआ।
इसमें सभी वादक-कलाकार महिलाएँ हैं। महिला यानि शक्ति का जीवन्त प्रतीक। लिहाज़ा इस अर्थ में ‘शक्ति का नाद, शक्ति द्वारा’ बन गया।
एक कहानी छोटी सी....
उस रोज पेशे से स्कूल शिक्षक सीमा अपनी कक्षा के बच्चों की कॉपियाँ जाँचने के लिए घर ले आई थीं। घर के रोज़मर्रा के कामों से फ़ारिग होने के बाद इत्मीनान से वह बैठक में कॉपियाँ जाँचने बैठी थीं। पति बगल में अपने मोबाइल पर वीडियो गेम खेलने में व्यस्त थे। हमेशा ही रहते थे। बहरहाल, जाँचने के लिए अभी पहले बच्चे की कॉपी का पहला पन्ना ही सीमा ने खोला ही था कि कुछ समय बाद उनके हाथ कॉंपने लगे। आँख से आँसू बहने लगे। आगे सब धुँधला सा गया।
भारत में छह लाख से अधिक गाँव हैं। देश की अधिकांश जनसंख्या इन्हीं गाँवों में रहती है। हालाँकि वर्तमान दौर में गाँवों की बड़ी आबादी रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रही है। इससे शहरों पर आबादी का बोझ बढ़ रहा है। इसका असर या कहें कि विपरीत प्रभाव हमारे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। अभी जब कोरोना महामारी का संक्रमण रोकने के मकसद से पूरे देश में तालाबन्दी हुई, तब हम सबको इन विपरीत प्रभावों की भयावहता का कुछ अंदाज़ भी हुआ। हमने लाखों ग्रामवासियों को पाँव-पाँव, पीड़ा भोगते हुए, शहरों से अपने गाँवों, घरों की तरफ़ लौटते देखा। इस सफर में हजारों लोग रेल की पटर
केन्द्र सरकार में उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान का निधन हो गया है। वे 74 साल के थे। गुरुवार, आठ अक्टूबर को उन्होंने दिल्ली के एक निजी अस्पताल में अन्तिम सॉंस ली। कुछ दिनों पहले ही उनके दिल की शल्य चिकित्सा (Operation) हुई थी। पासवान के निधन की उनके पुत्र और लोकजनशक्ति पार्टी के प्रमुख चिराग पासवान ने पुष्टि की है। रामविलास पासवान