…केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली को अब पता चला है कि इंसाफ दफन हो गया है। उनका यही कथन आज (आठ जून 2010) की पहली सुर्खी है। यह उनका दिल्ली में दिया गया बयान है। अदालत के फैसले पर जब कैमरे सामने और माइक मुंह पर लगे तो मंत्री महोदय ने यह फरमाया। वे उस अतीत को भूल गए, जब इंसाफ को दफन करने के लिए ताबूत, रस्सी, कीलों और कब्र की खुदाई के लिए गैंती-फावड़े उन्हीं की पार्टी के सत्ताधारी नुमाइंदों ने तैयार कराए थे। अफसरों को उन्होंने रोजगार गारंटी योजना के जॉब कार्डधारी मजदूरों की तरह इस काम में लगा दिया था। किसी के जॉब कार्ड पर लिखा था कलेक्टर, किसी के कार्ड पर एसपी…
इस पहले से तय फैसले और 25 साल पहले हुए हादसे में नया यह भी था कि इस बार तमाम टीवी चैनल भी मीडिया के फलक पर वजूद में थे। रोजाना सुबह से करिस्माती और सनसनीखेज सुख के शिकार में भटकने वाले टीवी पत्रकारों के लिए अदालत के सामने नाराज लोगों की भीड़ और एक ऐसे मामले का फैसला एक बड़ी खबर थी, जिसमें 15 हजार से ज्यादा लोग मौत के मुंह में चले गए थे, हजारों हमेशा के लिए बीमार बेकार हो गए थे। ये सब उस गैस के शिकार थे, जो यूनियन कार्बाइड के प्लांट से दो और तीन दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात लीक हुई थी। तब टीवी चैनल नहीं थे। सिर्फ दूरदर्शन था। वह भी आज के खबरी चैनलों की तरह चौबीस घंटे खबरों से भरा नहीं रहता था
फैसला सामने आते ही दोपहर बाद दिल्ली से लेकर भोपाल तक जानकारों की प्रतिक्रियाएं आने लगीं…
25 साल (अब 37) से गैस त्रासदी के मामले से या तो बेखवर या तमाशे की तरह देख रहे नेताओं ने घड़ियाली आंसू बहाए। जांच एजेंसियों ने सरकारी किस्म के बयान दिए। गैस पीड़ित संगठनों ने अफसोस जताने की रस्म अदायगी की।
हादसे के बाद सात दिसंबर 1984 को एंडरसन भोपाल आया था। हनुमानगंज थाना पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया। वह 25 हजार के मुचलके पर रिहा कर दिया गया। मुचलके की भाषा गोखले ने एंडरसन को पढ़कर सुनाई थी। इसके बाद एंडरसन ने उस पर दस्तखत किए थे। फिर उसे सरकारी विमान से दिल्ली रवाना कर दिया गया। 25 साल (अब 37) बीत गए हैं। इस बीच दुनिया बदल चुकी है। लेकिन हादसे के पीड़ितों के लिए वक्त वहीं ठहर गया। जिंदगी एक बोझ बन गई, जिसे वे अब तक ढो रहे हैं।…
…भोपाल के लिए आज का दिन कुछ खास है। राजधानी की नई जिला अदालत से आज एक खास फैसला आने वाला है। एक ऐसा फैसला जिसमें देर भी गजब की है और अंधेर भी जबर्दस्त। यह 25 साल पुरानी भोपाल की भयानक गैस त्रासदी का मामला है, जिस पर दुनिया भर की निगाहें हैं। मीडिया खासतौर से उत्साहित है।…चीफ ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट (सीजेएम) मोहन पी. तिवारी के कोर्ट रूम से आने वाली खबरों का सबको बेसब्री से इंतजार है। वे ही फैसला सुनाने वाले हैं।
‘भोपाल गैस त्रासदी : आधी रात का सच’, यह ऐसी कहानी है, जिसमें एक अदालती फैसले के सिवाय नया कुछ नहीं है। भोपाल में ज्यादातर तथ्य पहले से सब जानते हैं। लेकिन हादसे के बाद बीते इन (37) सालों में देश में एक नई पीढ़ी तैयार हुई है। उसे शायद ही हादसे की सच्चाइयाँ मालूम हों। शायद उसकी कोई दिलचस्पी भी न हो। जबकि उन्हें पता होना चाहिए कि जिस व्यवस्था में वे जिंदगी गुजारने वाले हैं, वह कैसी है? सत्ताधीशों को क्या करना चाहिए और करते क्या हैं? खासतौर से तब जब एक शहर ने हजारों लाश को सड़कों पर कीड़े-मकोड़ों की तरह पड़ा देखा हो। ऐसे कठिन समय में उनसे क्या उम्मीद की जानी चाहिए?
सुभाष चंद्र बोस के विचारों और कार्यों ने भारत में तमाम युवाओं को प्रेरित किया। इन्हीं में एक अग्रणी नाम था विनायक दामोदर सावरकर (1883-1965) का। वे भी क्रांति के पथ पर चलते हुए भारत से अंग्रेजी सरकार को उखाड़ फेंकने का मंसूबा पाले थे। उन्होंने 1919 में अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ‘हिंदु महासभा’ की स्थापना की। इस संगठन की छवि मुसलिम विरोधी बन गई थी क्योंकि यह भारतीय मुसलमानों को हिंदु धर्म में वापस लाने के लिए सक्रिय था। हालाँकि इसके कार्यक्रमों में दूसरा पहलू भी दिखता है।
बंगाल के विभाजन के ख़िलाफ़ हुआ आंदोलन वैसे तो राष्ट्रीय स्वरूप का था, फिर भी कुछ मुसलमानों ने इसका विरोध किया। इसे हिंदुओं की प्रतिक्रिया माना। ख़ास तौर पर मुसलिम आबादी की प्रतिक्रिया इस आंदोलन के विरुद्ध तीखी थी। उस पृष्ठभूमि में रूढ़िवादी मुसलिमों को प्रेरित किया कि कांग्रेस का मुकाबला करने के लिए उन्हें भी राजनीतिक संगठन बनाना चाहिए। इस समय तक आज़ादी के आंदोलन का नेतृत्व पूरी तरह कांग्रेस के हाथ में आ चुका था। साथ ही उसके बारे में यह राय भी बनने लगी थी कि उसके संगठन पर अतिवादी नेता हावी हो गए हैं। लिहाज़ा अल्पसंख्यक मुसलिम प्रतिक्रि
धार्मिक राष्ट्रवाद के प्रति वैसे, मध्यम वर्ग के उन सदस्यों में आकर्षण कम था जो कांग्रेस सदस्य तो थे ही, 1892 के परिषद-अधिनियम के बाद विधान परिषदों में भी चुने गए थे। इनमें अधिकांश डॉक्टर, वकील, स्कूल-शिक्षक, व्यापारी आदि थे। इन लोगों को सामान्यत: किसानों और उनकी परेशानियों से भी कम ही सहानुभूति थी। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि आज़ादी के आंदोलन के दौरान उदारवादी नेताओं का एक बड़ा वर्ग कानूनी पेशे से आया था। ज़ाहिर तौर पर उनके मन में कानून के प्रति सम्मान था। लिहाज़ा वे वैधानिक माध्यमों और प्रक्रिया से ही अंग्रेजों पर आज़ादी के लिए दबाव बनाने के पक्षधर थे
हिंदु राष्ट्रवाद का बीज भी बंगाल में ही पहली बार पड़ा था। वहाँ बंकिम चंद्र चटर्जी जैसे नेताओं और उनके कार्यों ने इसे खूब उत्प्रेरित किया। बंकिम चंद्र 1858 नए-नए स्थापित कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक करने वाले शुरुआती दो छात्रों में से एक थे। फिर 1891 तक नागरिक (सिविल) सेवा में रहे। लेकिन चूँकि भारतीयों के लिए अब तक सरकारी सेवा में विकल्प सीमित थे, इसलिए उन्हें उप-कलेक्टर (डिप्टी कलेक्टर-मजिस्ट्रेट) ही नियुक्त किया गया। उनकी पदोन्नति नहीं हुई। इस पद से वे सेवानिवृत्त हुए।