सरोकार

एंडरसन सात दिसंबर को क्या भोपाल के लोगों की मदद के लिए आया था?

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 3/2/2022

सात दिसंबर की हकीकत क्या है, यह सामने आना ही चाहिए। कुछ लोगों का मानना है कि एंडरसन वाकई चेरिटी के मकसद से यहां आया था। वह लोकसभा चुनावों के प्रचार का दौर था। हवाई जहाज की पायलटी छोड़कर राजीव गांधी देश को चलाने के लिए आगे आए ही थे। इंदिरा गांधी की मौत के बाद वे राजनीति की सवारी करने पर मजबूर हुए थे। उनके नेतृत्व में कांग्रेस पहली बार आम चुनाव के मैदान में थी। उनके राजनीतिक करियर की ये उनकी शुरूआती जनसभाएं थीं। जिस दिन एंडरसन भोपाल आया, राजीव गांधी हरदा में थे। अर्जुनसिंह भी वहीं थे। चुनावी सभा में राजीव गांधी के कहने पर अर्जुनसिंह ने एंडरसन साहब की जानकारी ली और उन्हें पत

सोनम वांगचुक से समझें, कैसे सुधरेंगे हमारे सरकारी स्कूल

टीम डायरी, 28/1/2022

सोनम वांगचुक को देश ही नहीं, दुनिया के दूसरे देशों में भी लोग जानते हैं। शिक्षाविद्। हमेशा नवाचार में लगे रहने वाले। हर समय देश के हित में सोचने वाले। उन्होंने कुछ समय पहले ही मराठी भाषा के ‘एबीपी माझा’ चैनल पर एक साक्षात्कार दिया। इसमें बताया कि भारत के सरकारी स्कूलों की दशा-दिशा कैसे सुधारी जा सकती है।

भोपाल गैस त्रासदी के समय बड़े पदों पर रहे कुछ अफसरों के साक्षात्कार...

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 27/1/2022

तत्कालीन गृह सचिव कृपाशंकर शर्मा : मुझे सीएस ने कुछ नहीं बताया 

• एंडरसन को बचाने में कौन किसके दबाव में था? कलेक्टर ने कहा कि सीएस ने कहा था?

→यदि सीएस ने ऐसा कहा तो सीएम की मर्जी से ही किया होगा। वैसे अर्जुनसिंह की कार्यशैली ऐसी नहीं थी कि वे एंडरसन जैसे अहम मामले में सिर्फ सीएस को कहकर फारिग हो जाते। उन्होंने सीएस के साथ कलेक्टर और एसपी को बुलाकर सीधी बात की होगी। ताकि ऊपर से नीचे तक यह स्पष्ट हो कि हुक्म किसका है? मैं तो कहता हूं कि भोपाल के उस वक्त के हालात के मद्देनजर उस वक्त ये अधिकारी ऐसा हुक्म मानने से इंकार कर सकते थे। 

वह तरबूज चबाते हुए कह रहे थे- सात दिसंबर और भोपाल को भूल जाइए

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 21/1/2022

हम तय वक्त पर मोतीसिंह के घर पहुंचे। दुआ-सलाम से ही लग गया कि वे तेल चुपड़े पहलवान की तरह सामने विराजित हैं, जो यह तय करके बैठे थे कि पकड़ में नहीं आना है। इसलिए दिसंबर 1984 के किसी भी सवाल पर उनका रटा रटाया सा जवाब मिलता-'नो कमेंट।’ कोई और बात कीजिए। उन्होंने कहा कि इस मीटिंग के पहले हम तय कर चुके हैं कि इस बारे में कोई बात नहीं होगी। यह समय गुजर जाने दीजिए फिर इत्मीनान से इस बारे में बात होगी। हादसे से जुड़े हर सवाल पर वे एक और बात दोहराते गए, 'मेरी किताब पढ़िए। उसमें मैंने सब कुछ लिख दिया है। आपके हर सवाल का जवाब मेरी किताब में है। ' 

गैस हादसा भोपाल के इतिहास में अकेली त्रासदी नहीं है

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 20/1/2022

गैस हादसा भोपाल के इतिहास में अकेली ऐसी त्रासदी नहीं है, जिसमें सियासत की साजिश, झूठ, फरेब, धोखे और बेकसूर लोगों की बेहिसाब मौतों के किस्से शुमार हों। रियासत के रूप में इसकी पैदाइश ऐसी ही त्रासदियों के बीच हुई है। यह कहानी शुरू होती है, अफगानिस्तान से एक महात्वाकांक्षी नौजवान के इस इलाके में कदम रखते ही। बेहतर कल और जिंदगी में कुछ कर गुजरने की तलाश में वह यहां आया था। बीस साल का वह नौजवान सबसे पहले दिल्ली के पास जलालाबाद में टिका। औरंगजेब की मौत के बाद मुगलिया सल्तनत में मची अफरातफरी और छीना झपटी के उस पागल दौर में उसकी तकदीर उसे मौजूदा मध्यप्रदेश की सीमाओं में ले आई। विद

ये जनता के धन पर पलने वाले घृणित परजीवी..

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 18/1/2022

अदालत ने फैसला सरकाकर चिराग घिस दिया था। जिन्न बाहर आ चुका था। संभवत: देश के इतिहास में यह अकेला मामला है, जिसका हर तथ्य ढाई दशक पुराना था। नया कुछ नहीं था। सिवाय एक फैसले के जो अपने कानूनी दायरे में पहले से तय था। लेकिन इस फैसले के बाद घटनाएं ऐसी जुड़ी कि पुरानी बोतलों में से एक से बढ़कर एक जिन्न बाहर आए। कई चेहरे बेनकाब हुए। कई सच्चाइयों से पहली बार परदा उठा। अनगिनत भूले-बिसरे सच एक श्रृंखला में सामने आ गए। 

कुंवर साहब उस रोज बंगले से निकले, 10 जनपथ गए और फिर चुप हो रहे!

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 17/1/2022

मध्यप्रदेश में अर्जुनसिंह को एक रहमदिल और मददगार नेता मानने वाले मीडिया में भी कम नहीं हैं। कई वरिष्ठ साथी अपने अनुभव से उदाहरण भी गिनाते हैं। किसी गरीब की बेटी की शादी का प्रसंग हो, किसी जरूरतमंद को नौकरी की दरकार हो या किसी बीमार आदमी को इलाज की जरूरत। ऐसे नितांत निजी मामलों की जानकारी मिलते ही वे बतौर मुख्यमंत्री खुद दिलचस्पी लेकर फौरन मदद दिलाने में कभी पीछे नहीं रहते थे। ऐसे अनगिनत किस्से लोगों को याद हैं कि उन्होंने किस-किस तरह से लोगों को वक्त जरूरत मदद दिलाई। लेकिन उनकी छवि का यह उजला और प्रेरक पहलू उस तस्वीर से कतई मेल नहीं खाता, जो गैस हादसे में दुनिया के सामने आई। उन जैसे मानवीय

आप क्या सोचते हैं? क्या नाइंसाफियां सिर्फ हादसे के वक्त ही हुई?

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 12/1/2022

यूनियन कार्बाइड फैक्टरी की सुरक्षा पर सरकार को हर महीने करीब दो लाख रुपए खर्च करना पड़ रहे हैं।… विशेष सशस्त्र बल (एसएएफ) के साथ ही होमगार्ड के जवान भी फैक्टरी परिसर में तैनात हैं। फैक्टरी की जमीन और परिसर में स्थित संपत्ति फिलहाल जिला प्रशासन के कब्जे में है। प्रशासन के सूत्रों के अनुसार 1999 में जब सरकार के एक निर्णय के तहत फैक्टरी परिसर का कब्जा उद्योग विभाग से कलेक्टर (गैस त्रासदी एवं पुनर्वास) को सौंपा था, तब सुरक्षा का जिम्मा प्राइवेट सिक्युरिटी एजेंसी के हाथों था। जून 2003 से प्रशासन ने यहां होमगार्ड जवान तैनात कर दिए।… 

सिफारिशें मानने में क्या है, मान लेते हैं...

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 7/1/2022

मप्र सरकार गैस त्रासदी पर भोपाल सीजेएम कोर्ट के फैसले के विरुद्ध सत्र न्यायालय में अपील दायर करेगी। साथ ही वह सुप्रीम कोर्ट में भी धारा 304 दो का प्रकरण रीओपन करने के लिए याचिका दाखिल करने जा रही है। प्रदेश सरकार के प्रवक्ता और विधि मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने एक प्रेस कांफ्रेंस में इस मामले को लेकर गठित विधि विशेषज्ञों की कमेटी के निष्कर्षों की जानकारी दी। 

इन्हें ज़िन्दा रहने की ज़रूरत क्या है?

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 5/1/2022

एक बार फिर पुरानी फाइलों में से कुछ चौंकाने वाले खुलासे हुए।…गैस त्रासदी के मूल दस्तावेजों से छेड़छाड़ की गई है। ऐसा मुजरिमों को बचाने के लिए और मामूली सजा दिलाने के लिए किया गया। दस्तावेजों से जाहिर है कि 3 दिसंबर 1984 को दर्ज हादसे की एफआईआर और पांच दिसंबर को कोर्ट के रिमांड आर्डर में भारी हेराफेरी की गई है। इन दस्तावेजों को हमने कानून के विशेषज्ञों, नेशनल लॉ इंस्टिट्यूट के सदस्यों और प्रदेश सरकार की विधि विशेषज्ञों की समिति के सदस्य शांतिलाल लोढ़ा से भी तस्दीक कराया। 

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