दिसंबर 1916 में इंग्लैंड में रुढ़िवादियों की सरकार बनी। लेकिन प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज उदारवादी थे। उन्होंने अगले साल जुलाई में एडविन मॉन्टेग्यू को गृह मंत्रालय में भारत से जुड़े मामले देखने के लिए, खास तौर पर तैनात किया। वे भी उदारवादी थे। उन्होंने 20 अगस्त 1917 को संसद के निचले सदन ‘हाउस ऑफ कॉमंस’ में घोषणा की, “भारत के संबंध में हमारी सरकार की नीति ये है कि शासन-प्रशासन की सभी शाखाओं में भारतीयों को ज्यादा से ज्यादा सहभागी बनाया जाए। भारत की स्वशासी संस्थाओं का विकास किया जाए। भारत की उत्तरदायी सरकार ब्रिटिश साम्राज्य अविभाज्य हिस्सा है। लिहाज़ा इस दिशा में जो कदम ज़रूरी है
ब्रिटेन में 1906 में बनी उदारवादी सरकार मानती थी कि भारतीयों की माँगों का समाधान करना होगा। इसलिए उसने तय किया कि भारत में अप्रत्यक्ष शासन की व्यवस्था करनी चाहिए। तब ब्रिटेन में गृह मंत्री जॉन मॉरले थे। इधर भारत में लॉर्ड मिंटो (1905-1910) वायसराय बन चुके थे। मिंटो मानते थे कि सिर्फ़ भारतीय मध्यम वर्ग की भावनाओं/इच्छाओं का ख्याल रखते हुए बदलाव नहीं करने चाहिए। भारतीय राजा-महाराजाओं की परिषद भी गठित करनी चाहिए। ताकि कांग्रेस से अलग राय भी सरकार को मिले। उधर, मॉरले के दिमाग में यह बिलकुल नहीं था कि अभी भारत में ब्रिटेन की तरह संसदीय संस्थाएँ होनी चाहिए। लिहाज़ा, 1909 में जब
साल 1905 में अंग्रेजी सरकार ने बंगाल का विभाजन कर दिया। इसका मक़सद बताया, प्रशासन की कार्यकुशलता बढ़ाना। लेकिन इससे भारतीय शिक्षित वर्ग में संदेश गया कि सरकार उनके विचारों की अनदेखी का इरादा रखती है। इस बारे में सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने लिखा था, “हमें लगता हैं, जैसे हमारा पूरा भविष्य दाँव पर है। बंगालीभाषी समाज के लिए बढ़ते समर्थन और उसमें बढ़ती आत्म-चेतना, व्याकुलता के मद्देनज़र जानबूझकर आघात किया जा रहा है।” उस दौर में एक पूर्व नौकरशाह थे, रोमेश चंद्र दत्त। साल 1900 के आसपास वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे। उन्होंने तब वायसराय लॉर्ड कर्जन को खुले आलोचनात्मक
ऐसे ही एक उल्लेखनीय ब्रिटिश विचारक-प्रशासक थे, अलफ्रेड लॉयल। वे अप्रत्यक्ष शासन प्रणाली के समर्थक विचारों के प्रवक्ता थे। उन्होंने और उनके जैसे अन्य लोगों ने पूरे दिल से स्टीफन और स्ट्रेची के विचारों को अपनाया। बस एक फ़र्क था कि लॉयल राजनीतिक अधिकारों को प्रयोग में लाने के लिए ताक़त और सेना के इस्तेमाल के पक्षधर नहीं थे। वे न दूसरे देशों के समाजों के पश्चिमीकरण के पक्ष में थे और न ऐसी राजनीतिक संस्थाएँ उन पर थोपने के, जिनका मूल स्थानीय परम्पराओं में न हो। उनका मानना था कि पश्चिमी सभ्यता का हिंदुस्तान पर असर ये होना था कि भारतीय समाज के बंध खुल जाएँ। उनका कहना था, “हम (अंग्र
स्टीफन का दृष्टिकोण व्यावहारिक था। सिद्धांतों की उन्होंने ज़्यादा परवाह नहीं की। उन्होंने कानून के सामान्य ढाँचे को आकार दिया। जहाँ विशिष्ट किस्म की ख़ामियाँ देखीं, वहाँ उनके समाधान भी सुझाए। अपने पूर्ववर्तियों की तरह वे भी ग्रामीण समुदाय के मौज़ूदा ढाँचे की ‘जड़ता’ को तोड़ना चाहते थे। उन्होंने लिखा था, “यह तथ्य है कि ग्रामीण समुदाय के संस्थानों में, वे चाहे कहीं के भी हों, सदियों से बहुत मामूली बदलाव ही आया है। इससे साबित होता है कि भारतीय समुदाय भी सदियों से ठहरी हुई अवस्था में है। यह स्थिति संपदा, बौद्धिकता, राजनीतिक अनुभव और नैतिक तथा बौद्धिक परिवर्तनों के अनुकूल नहीं है।
विद्रोह के बाद भारत की सरकार की कार्यशैली और उसकी सोच भी बदली थी। पहले यह यक़ीन हुआ करता था कि अंग्रेजों और भारतीय मध्यवर्ग के बीच कामकाजी समन्वय, सहयोग की स्थिति बन जाती है तो सुधार भी तेज हो सकते हैं। लेकिन बग़ावत ने इस यक़ीन का अंत कर दिया। अब उन कानूनों का स्वरूप भी बदला जाने वाला था, जो 1860-70 के दशक में बनाए गए थे। ये अब आक्रामक होने वाले थे। यह नई कार्यशैली पंजाब में लागू व्यवस्था से मिलती-जुलती थी। कठोर और हर चीज को अपनी बपौती मानने वाली। सरकार की कोशिश थी कि अब अधिक सक्षम, आधुनिक शासन-व्यवस्था लागू की जाए। इसे विशेषज्ञ संचालित करें, जो संहिताबद्ध नियम-कानून से लैस
बग़ावत के बाद भी अंग्रेज प्रशासकों, सैनिकों, सैन्य अफ़सरों आदि ने अपने पूर्ववर्तियों की साहित्यिक परंपरा जारी रखी। इनमें ज़्यादातर लोगों की कृतियाँ इतिहास और प्रशासन पर केंद्रित थीं। डब्ल्यूडब्ल्यू हंटर का नाम इनमें प्रमुख है। उन्होंने भारतीय इतिहास को खँगाला। मौलिक दृश्यों से भी तत्त्व निकाले। ऐसे ही, जॉर्ज ओट्टो ट्रेवेलियन की पुस्तक ‘कॉम्पटीशन-वल्लाह’ (1864)। इसमें 1857 की क्रांति के बाद के माहौल का चित्रण-विवरण है। अंग्रेज अफ़सरों में कुछ अपनी विशिष्ट शैली में लिखते थे। जैसे- एसएस थोरबर्न। उनकी किताब- ‘मुसलमंस एंड मनीलेंडर्स’ 1886 में आई। यह पंजाब प्रांत पर केंद्रित थी। म
सन् 1857 का विद्रोह ने भारतीय और भारत में रह रहे ब्रिटिश समुदाय के बीच खाई पैदा कर दी थी। हालाँकि कई जगहों पर अंग्रेज अधिकारी और सैनिक भारतीयों से संबंध बनाकर चल रहे थे। लेकिन ये औपचारिक ही थे। भारतीय संस्कृति में दिलचस्पी रखने वाले अंग्रेज अफ़सरों की संख्या तो नगण्य ही थी। सरकारी नौकरी या न्यायिक ढाँचे में भारतीयों को अधिक प्रतिनिधित्व देने की हर कोशिश का अब अंग्रेज विरोध कर रहे थे। भारतीयों में बढ़ती राष्ट्रीयता की भावना और सांप्रदायिक हिंसा ने उनका भय बढ़ा दिया था।
मई 1944 में महात्मा गाँधी को उनके बिगड़ते स्वास्थ्य के आधार पर जेल से रिहा किया गया। बाहर आते ही उन्होंने सबसे पहले मुस्लिम लीग के मोहम्मद अली जिन्ना से बातचीत की। लेकिन इस वार्ता का कोई नतीज़ा नहीं निकला। फिर मार्च 1945 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड वॉवेल नए प्रस्ताव के साथ लंदन से भारत लौटे। इसके मुताबिक वायसराय की कार्यकारी परिषद में अब सिर्फ़ भारतीय सदस्य रहेंगे। बस, कमांडर-इन-चीफ को छोड़कर। परिषद के सदस्य सभी राजनैतिक दलों से होंगे। इसमें हिंदु, मुसलमानों का बराबर प्रतिनिधित्व होगा। इस प्रस्ताव पर बातचीत के लिए जून 1945 में शिमला सम्मेलन हुआ। मग़र इसमें कोई नतीज़ा नहीं निकला
मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार में प्रावधान था कि हर 10 साल में इसके परिणामों की समीक्षा होगी। इसी के मुताबिक ब्रिटेन की रूढ़िवादी (कंज़रवेटिव) सरकार ने 1927 में सर जॉन साइमन की अगुवाई में आयोग बनाया। अगले साल यह आयोग भारत आया। लेकिन राष्ट्रवादी नेताओं ने उसका बहिष्कार कर दिया। फिर भी उसने रिपोर्ट तैयार की जो 1930 में जारी हुई। इसी बीच ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बन गई। उसने हिंदुस्तान के तत्कालीन वायसराय को लंदन बुलाया। उन्होंने भारत लौटकर ऐलान किया कि भारत को स्वतंत्र-उपनिवेश का दर्जा मिलेाग। यह भी घोषणा की कि लंदन में जल्द एक सम्मेलन होगा। इसमें भारत के सभी क्षेत्रों क