...खबर मिली है कि भारत ने डाऊ कैमिकल्स को इस बात की गारंटी दे दी थी कि उसे पैतृक कंपनी यूनियन कार्बाइड के अपराध यानी भोपाल गैस त्रासदी का जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा। आरटीआई याचिका को मिले जवाब में यह संदेह पुख्ता हो रहा है। 2006 में डाऊ केमिकल्स के तत्कालीन सीईओ लिवरिस द्वारा अमेरिका में भारतीय राजदूत रोनेन सेन को लिखा पत्र यही कहता है। एंड्रयू ने साफ कहा है कि डाऊ केमिकल्स 1984 के भोपाल हादसे के लिए जिम्मेदार नहीं है।
किसी को उम्मीद नहीं थी कि अदालत का फैसला 25 साल (अब 37 साल) पुराना रायता ऐसा फैला देगा। मीडिया में जो कुछ भी खुलकर आ रहा था, उससे पहली बार व्यापक रूप से जाहिर हो रहा था कि हादसे के बाद हुए षड्यंत्रों, फायदे के सौदों आपराधिक अनदेखी, केस को कमजोर करने और दोषियों को बचाने क एक लंबा सिलसिला चला था, जिसमें सबने खुशी-खुशी हाथ बटाए थे। ये सारे चेहरे बेनकाब हो रहे थे…
राजीव सरकार में आंतरिक सुरक्षा मंत्री अरुण नेहरू ही यूनियन कार्बाइड मामले को देख रहे थे। हालांकि वे मंत्रिमंडल में 1986 में आए, लेकिन उसके पहले भी सरकार में उनकी तूती बोलती थी। प्रणब मुखर्जी ने जो 1995-96 में विदेश मंत्री थे और उन्होंने एंडरसन को फाइल आगे नहीं बढ़ाई थी। इसी कारण वे भी बैकफुट पर हैं। रविवार को मुखर्जी और नेहरू दोनों ने ही सात दिसंबर 1984 की प्रेस कॉन्फ्रेंस में अर्जुनसिंह के बयान को आधार बनाकर एंडरसन की रिहाई का दोषी उन्हें ही बता दिया।
दिल्ली में कांग्रेस पूरी कोशिश में है कि उसके महान् नेता राजीव गांधी की बेदाग बचा लिया जाए। एंडरसन की सुरक्षित रिहाई के दाग उनके दामन पर न आएं। 25 साल (अब 37) पहले इसी पार्टी की सरकारें जीवित एंडरसन को बचाने में लगी थीं। अब राजीव गांधी का ख्याल सबसे ऊपर है। बेमौत मारे गए हजारों बेकसूर लोगों और इतने सालों से तकलीफ झेल रहे हजारों दूसरे पीड़ितों से ज्यादा अहम यह है कि एक दिवंगत शख्स के दामन को बचाया जाए।
अशोक वर्णवाल (मध्य प्रदेश के वरिष्ठ आईएएस अफसर) ने लिखा…
मोती सिंह के सामने विकल्प था कि वे किसे चुनें- 'मैं नहीं तो कोई और' या 'मैं नहीं भले कोई और।' उन्होंने पहला और आसान लगने वाला विकल्प चुना। कोई और उस काम को करने के लिए राजी हो सकता था तो वे क्यों नहीं।
कलपेश (याग्निक) जी की टिप्पणी है…
मुट्ठी भर मठाधीश, पांच लाख निर्दोषों को छल रहे हैं। पूरे 26 बरस से। तब ये बेगुनाह निर्ममता से बर्बाद कर दिए गए। अब निर्लज्जता से प्रताड़ित किए जा रहे हैं। कानून के नाम पर। किंतु अन्याय की सीमा होती है। न्याय करने वाले हर व्यवस्था में होते ही हैं। दुखद यह है कि उन्हें झकझोरना पड़ता है। भोपाल गैस त्रासदी मामले में अदालती आदेश के बाद ऐसा करने का समय आ गया है।
हादसे के जिम्मेदारों को लेकर अब तक यहां-वहां मंडराते रहे कई अहम सवाल सतह पर आकर देश भर गरमागरम बहस का विषय बन चुके थे। जैसे अचानक ज्वालामुखी फटा और लावा बाहर बह निकला। जो जवाबदेह थे और जीवित थे, वे निशाने पर आ गए। लेकिन हर कोई बच रहा था और दूसरों पर जिम्मेदारी डाल रहा था। जो दिवंगत थे, वे भी सुर्खियों में समाने लगे।…
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह से उस व्यक्ति का नाम बताने का आग्रह किया है, जिसने उन्हें एंडरसन को तत्काल रिहाई की व्यवस्था करने को कहा था। इस बाबत उन्होंने श्री सिंह को एक पत्र लिखा है। इसमें मुख्यमंत्री ने लिखा कि पिछले 72 घंटों (फैसला आने के बाद) से देश इंतजार कर रहा है कि आप इस मामले में सच्चाई उजागर करें मप्र और खासतौर से भोपाल की जनता को यह अधिकार है कि वह अपने तत्कालीन मुख्यमंत्री से हकीकत जान सके। चौहान साहब, ऐसे मासूम मत बनो। आप भी जानते हो कि ऐसी चिट्ठियों को कितनी संजीदगी से लिया जाता है। यह मानना पड़ेगा कि आपका यह वक्तव्य जरूर
सीजेएम कोर्ट के फैसले का पूर्व जिला न्यायाधीश रेणु शर्मा ने अध्ययन किया। इसमें वे बता रही हैं कि यूनियन कार्बाइड में किस कदर तकनीकी खामियां थीं, जिन पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया। भोपाल प्लांट की डिजाइन में न सिर्फ खामियां थीं बल्कि उसमें सुरक्षा मानकों का भी पालन नहीं किया गया। कोर्ट द्वारा दिए फैसले में यह बात सामने आई कि फैक्टरी में ऐसी किसी तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया गया जिससे कार्बाइड प्लांट में गैस लीक होने की जानकारी तत्काल मिल सके। यह पूरी तरह मानव अनुभव पर ही निर्भर थी।
…केंद्र में सरकार तब राजीव गांधी की थी। लाल साहब के इस खुलासे (केंद्र सरकार की ओर से साफ निर्देश थे कि वॉरेन एंडरसन को भारत लाने की कोशिश न की जाए।) पर केंद्र की मौजूदा सरकार (फैसले के वक्त भी कांग्रेस की ही थी) अपनी खाल नहीं बचाएगी तो और क्या करेगी? तो तत्काल प्रभाव से वीरप्पा मोइली (तत्कालीन कानून मंत्री) ने लाल को ही लपेट दिया। मोइली ने कहा कि एंडरसन अगर पकड़ से बाहर हैं तो उसके लिए सीबीआई के तत्कालीन जांच अधिकारी बीआर लाल ही जिम्मेदार हैं। उन्हीं की वजह से आज एंडरसन के प्रत्यर्पण में दिक्कतें आ रही हैं।