देखी-सुनी

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

ऐसा हम नहीं, बड़े-बुज़ुर्ग कह गए हैं...

टीम डायरी, 8/7/2021

बड़ों की बातें हैं। इसी तरह की होती हैं। सालों पहले कही जाती हैं। सालों बाद तक सुनी जाती हैं। उनकी कीमत कहे जाते वक्त जितनी होती है, सुने जाते समय उससे और अधिक बढ़ जाती है। फिर अगर कहीं गुन ली जाए, तो क्या ही कहने, तब वे बातें किसी भी कीमत की हद पार कर लिया करती हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

कबीर की वाणी, कोरोना की कहानी...साधो ये मुर्दों का गाँव...!

टीम डायरी, 24/6/2021

आज संत कबीरदास जी की जयन्ती है। ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा तिथि। सन् 1398 में कबीरदास जी का जन्म हुआ, ऐसा बताया जाता है। मतलब आज से लगभग 623 बरस पहले। लेकिन इतना समय बीत जाने के बाद कबीर आज भी प्रासंगिक हैं। दो-दो, चार-चार लाइनों के छन्द और दोहों में वे सब जो कह गए हैं। जीवन के निचोड़ बता गए हैं। कोरोना के इस कालखंड में (वीडियो में कही जा रही) उनकी इस रचना को ही लें। हर शब्द, हर लाइन हथौड़े की तरह हम पार चोट करती है। हमें झिंझोड़ती है। हमारी आँखें खोलने की कोशिश करती है। जीवन का सबसे बड़ा सच दिखाने का प्रयास करती है।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

खुशी, कुछ सीखो अपनी बहन परेशानी से!

टीम डायरी, 6/6/2021

एक छोटी सी कविता। बड़ा सा विचार। ये बताता है कि ख़ुशी की तलाश में भटकते हम दरअसल उसे अपने नज़दीक देख नहीं पाते। महसूस नहीं कर पाते।

बड़ी-बड़ी चीजों में उसे ढूँढ़ते रहते हैं। पूरी ज़िन्दगी इस तलाश में खपा देते हैं। लेकिन जब भी कभी मिलती है तो बेहद छोटी-छोटी सी चीजों में। कम वक़्त के लिए।

जब भी मिलती है तो छोड़ने का मन नहीं होता। लेकिन बड़ी चीजों में तलाशने का हमारा भ्रम, दुविधा और मृगतृष्णा हमेशा उसे हमेशा हमसे दूर ले जाता है।

और हम... बस, तलाशते रह जाते हैं। सहेज नहीं पाते।

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संघर्ष और साधना की ये कहानी सिर्फ़ सिद्धू की नहीं, शख़्सियत बने हर शख़्स की ह्रै

ज्योति प्रकाश त्यागी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 28/5/2021

नवजोत सिंह सिद्धू। भारतीय क्रिकेट की दुनिया में धाकड़ बल्लेबाज के तौर पर जाना-पहचाना नाम। फिर जब क्रिकेट की दुनिया छोड़ी तो वक्तृत्व कला (Art of Oratory) के क्षेत्र में उससे भी बड़ा नाम। राजनीति में आए तो उसमें भी पीछे की बेंच पर नहीं ही दिखे।

लोग अक्सर उनके ये कारनामे देख चौंकते हैं। पूछते हैं- कैसे कर पाए इतना कुछ? हर किसी के वश में तो नहीं होता? कोई एक जन्म में किसी एक क्षेत्र विशेष को ही अच्छी तरह साध ले, वही बड़ी बात है?

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

तेज गए तो भटक जाओगे, धीरे गए तो पहुँच जाओगे!

टीम डायरी, 27/5/2020

आचार्य रजनीश ‘ओशो’ के प्रवचनों का हिस्सा है, ये ऑडियो। एक बौद्ध कथा के जरिए वे बता रहे हैं, ‘तेज गए तो भटक जाओगे, धीरे गए तो पहुँच जाओगे।’

वे ध्यान दिला रहे हैं कि अगर हमें कुछ साधना है तो हमारी गति धीमी होनी चाहिए। क्योंकि तेज गति से हम सिर्फ़ क्षणभंगुर भौतिक सुख-सुविधाएँ, पद, पैसा आदि ही हासिल कर सकते हैं। सुख और शान्ति नहीं। आनन्द नहीं। 

एक और उदाहरण देते हुए वे कह रहे हैं, अगर बड़े पेड़ की तरह कद हासिल करना है, अपनी छाँव में जीवों को आसरा देना है, उन्हें मधुर फल देना है, सालों-साल टिके रहना है, तो धीरे-धीरे बढ़ना होगा। एकदम फर्राटे से नहीं। 

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

चरित्र जब पवित्र है, तो क्यूँ है ये दशा तेरी?

टीम डायरी, 23/5/2020

साल 2016 में एक फिल्म आई थी, ‘पिंक’। समाज में महिलाओं की व्यथा, उनकी पीड़ा, उनके संघर्ष को दिखाती एक कहानी। इसी फिल्म में एक कविता थी, ‘तू चल, तेरे वज़ूद की समय को भी तलाश है’। इन ख़ूबसूरत लब्ज़ों को अपनी कलम से कागज़ पर उतारा था, गीतकार तनवीर ग़ाज़ी ने। जबकि आवाज़ दी थी, हिन्दी सिनेमा के सबसे बड़े सितारे की हैसियत पा चुके अमिताभ बच्चन ने। 

योगेश बलवानी, गौरव बजाज

‘आयुष्मान् भव’ या ‘आयुष् मा भव’ यानि ‘चिरायु हों’ अथवा ‘चिरायु न हों’?

टीम डायरी, 17/5/2021

ये पहला वीडियो मध्य प्रदेश के भोपाल शहर के ‘आम शख़्स’ योगेश बलवानी का है। और दूसरा शहर के बड़े ‘ख़ास अस्पताल’ चिरायु के प्रबन्धक गौरव बजाज का। ये अस्पताल इतना ख़ास है कि जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके जैसे दूसरे बड़े सत्ताधारी विशिष्ट जन कोरोना संक्रमित होते हैं, तो यहीं का रुख़ करते हैं। फिर ठीक होकर लौटते भी हैं।

प्रभु जोशी जी

हिन्दी, हिंग्लिश, तमिलिश

टीम डायरी, 7/5/2020

देश के जाने-माने चित्रकार, कहानीकार, संपादक, आकाशवाणी अधिकारी और टेलीफिल्म निर्माता प्रभु जोशी जी ने इसी चार मई को हमेशा के लिए आँखें बन्द कर लीं। वे कोरोना संक्रमित थे। लेकिन जाने से पहले से अपने इस वीडियो के जरिए भाषायी सरोकार पर हमारी आँखें खोलने का प्रयास भी कर गए। वे बता गए कि कैसे हमारी राष्ट्र भाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को ख़त्म करने की मानो कोई साज़िश हो रही है। और हम उस साज़िश में जाने-अनजाने हिस्सेदार बन रहे हैं। साथ ही हमें चेता गए कि अगर हम आज सचेत नहीं हुए तो सम्भवत: कल को हमारी पहचान का संकट भी हमारे सामने उपस्थित हो सकता है।

एक कहानी ; उम्मीद के दीए की...

वैष्णवी द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश से, 30/4/2021

 

वक़्त मुश्किल है। एक अदृश्य दुश्मन (कोरोना) है, जिसने मानवता के ख़िलाफ़ जंग छेड़ रखी है। हमारे घरों में घुसकर हमारे अपनों को वह हमसे छीन रहा है। व्यवस्थाएँ पस्त हैं और अव्यवस्थाएँ मस्त। पूरा माहौल निराशाजनक है।

लेकिन वास्तव में यही हमारे लिए परीक्षा की घड़ी है। घनघोर निराशा के अन्धकार में भी हमें अपने आप पर यक़ीन करना होगा। ईश्वर पर भरोसा रखना होगा। ये मानना होगा कि जल्द ही सब ठीक हो जाएगा। उम्मीद का दीया जलाए रखना होगा।

माँ की ममता, घर की विवशता और डॉक्टर का फ़र्ज़

शिखा पांडे, अहमदाबाद, गुजरात से, 12/4/2021

जीवन में कई बार छोटी-छोटी कहानियाँ बड़ी सीख दे जाती हैं। लेकिन वे कहानियाँ सबसे सुन्दर होती हैं, जो इंसानियत का पाठ पढ़ाती हैं।

इस छोटी-सी कहानी को सुनकर महसूस किया जा सकता है कि हमें किस तरह सबसे पहले अपने कर्त्तव्य पर ध्यान देना चाहिए। पैसा तो आना-जाना है। इस पल किसी हाथ में है, तो अगले में और के हाथ में होगा।

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