तेज गए तो भटक जाओगे, धीरे गए तो पहुँच जाओगे!

आचार्य रजनीश ‘ओशो’ के प्रवचनों का हिस्सा है, ये ऑडियो। एक बौद्ध कथा के जरिए वे बता रहे हैं, ‘तेज गए तो भटक जाओगे, धीरे गए तो पहुँच जाओगे।’

वे ध्यान दिला रहे हैं कि अगर हमें कुछ साधना है तो हमारी गति धीमी होनी चाहिए। क्योंकि तेज गति से हम सिर्फ़ क्षणभंगुर भौतिक सुख-सुविधाएँ, पद, पैसा आदि ही हासिल कर सकते हैं। सुख और शान्ति नहीं। आनन्द नहीं। 

एक और उदाहरण देते हुए वे कह रहे हैं, अगर बड़े पेड़ की तरह कद हासिल करना है, अपनी छाँव में जीवों को आसरा देना है, उन्हें मधुर फल देना है, सालों-साल टिके रहना है, तो धीरे-धीरे बढ़ना होगा। एकदम फर्राटे से नहीं। 

सोचकर देखें क्या गति के चुनाव की ऐसी गलती अक्सर हम सब नहीं करते? यक़ीनन करते हैं। इसीलिए हम में से अधिकांश अपने लक्ष्य से भटके हुए हैं। ‘बहुत कुछ’ पाकर भी बेचैन हैं। अशान्त हैं। और ऐसे ही रहते हैं, अक्सर। 

-----
(यह ऑडियो एक वॉट्सएप समूह के जरिए #अपनीडिजिटलडायरी तक पहुँचा है। इसमें मौज़ूद प्रेरक तत्वों की वज़ह से इसे ‘डायरीवाणी’ में दर्ज़ किया जा रहा है। ताकि डायरी के पाठक/श्रोता भी लाभान्वित हो सकें।)

Add new comment

Plain text

  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <img> <h2> <h1> <h3> <div> <span> <section> <b> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd> <p> <table> <td> <tr><iframe>