देखी-सुनी

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

शान्ति और स्थिरता व्यक्तित्व में गहराई से आती है..

रैना द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश से, 20/1/2021

अक्सर कहा जाता है, ‘गहरी नदी का बहाव हमेशा शान्त होता है।’ एकदम सही है। लेकिन क्या इसी ‘कहन’ का दूसरा पहलू ये नहीं है कि शान्ति और स्थिरता गहराई से ही आती है। फिर चाहे वह गहराई पानी की, नदी की हो या फिर व्यक्तित्व की।

पानी की कहानी, पानी की ज़ुबानी : मैं जल... मैं कल... मुझे सुनिए... मैं घायल!

देवांशी वशिष्ठ, दिल्ली से, 17/1/2021

मैं, जल, आपका प्राण। मेरी एक घूँट में ही जन्नत का आराम मिलता है। जब आप मुझे पीते हैं तो पानी हो जाता हूँ। जब सूर्य को चढ़ाते हैं, तो जल। मैं पंचमहाभूतों में से एक हूँ, जिनसे सृष्टि की रचना हुई है। मेरे बिना सब सून है। इसीलिए रहीम कह गए हैं... रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

रसूब, दिल बड़ा होने से बढ़ता है या दिमाग चढ़ा होने से?

रैना द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 6/1/2021

निश्चित रूप से यह एक बड़ा सवाल है कि हमारा रसूख यानि ‘स्टेटस’ सही मायने में आखिर बड़ा कैसे होता है? हमारा दिल बड़ा होने से या दिमाग चढ़ा होने से?

प्रतीकात्मक तस्वीर

हमारी सोच और ईश्वर का न्याय

रैना द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 30/12/2020

अक्सर हम ईश्वर के न्याय पर सवाल उठाते हैं। हमारी यह मनोदशा खास तौर पर उस समय होती है, जब हमें लगता है कि हमारे साथ अन्याय हुआ है। ऐसे मौकों पर हम हमेशा सोचते हैं कि हमने तो कभी किसी के साथ गलत किया नहीं। फिर हमें ही ईश्वर ने तकलीफ़ क्यों दी? हमें औरों से कम क्यों दिया? वहीं दूसरी तरफ जिन लोगों काे हम हमेशा गलत करते देखते हैं, उन्हें सुख भोगते हुए पाते हैं। तब फिर हमारे मन में सवाल उठते हैं कि ईश्वर उन्हें पीड़ित-प्रताड़ित क्यों नहीं करते?

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

प्यार को आसरा देने वाले का किस्सा

रैना द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से; 17/12/2020

कहने को तो यह एक बोध-कथा है। लेकिन गौर करें तो सम-बोधकथा सी लगेगी। ऐसी जो समान रूप से हमारी भावनाओं, संवेदनाओं को सम्बोधित करती है। सीधे हमको हमसे रू-ब-रू कराती है। हमें बताती है कि हमारी रोजमर्रा की आपाधापी अगर हमसे कोई चूक हो रही है तो वह कहाँ? और उसे अगर हम सुधारना चाहें तो वह कैसे? इसीलिए सुनने लायक बन पड़ी है। एक बार ही नहीं कई बार, बार-बार।

कुछ अच्छी चीजें हमारे अभ्यास में आ जाएँ, उसके लिए यही एक तरीका भी तो है... बार-बार उनसे दो-चार होते रहना!

---------

केल्हौरा की कहानी बताती है कि गाँव के भीतर से ही जल, जंगल, ज़मीन की सूरत बदल सकती है!

टीम डायरी, 12/12/2020

ये एक छोटे से गाँव की बड़ी कहानी है। देखी जा सकती है, सुनी जा सकती है और गुनी भी। यानि इस पर विचार किया जा सकता है। इससे सीखा जा सकता है। इसकी मिसाल पर अमल किया जा सकता है। 
 

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

संवेदना : एक कहानी, गाय-बछड़े और दो चादर में छिपी भावनाओं की

रैना द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 10/12/2020

अख़बारों में अक्सर ही छपने वाली छोटी-छोटी कहानियों पर हम में से कितने लोग ध्यान देते हैं? शायद ही कुछ लोग देते हों। बावज़ूद इसके कि इन कहानियों में बड़ी मर्म की बातें लिखी होती हैं। तिस पर इनके पीछे किसी न किसी का हुनर भी तो होता है। कोई ऐसा, जो अपनी पहचान, अपने रचनाधर्म के लिए छटपटा रहा होता है। हम सबके लिए बड़ी शिक्षाएँ इनमें छिपी होती हैं। अपने बच्चों को मार्गदर्शन देने का रास्ता हमें दिखाती हैं। अपने साथ किसी को सुनने, समझने-बूझने  के नुस्खे हमें दे जाती हैं। और न जाने कितना-कुछ होता है, इनमें। ये कहानियाँ बोलती नहीं हैं, पर कहती बहुत-कुछ हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

हम खुद मजबूत होंगे, तब ही किसी की मदद कर सकेंगे

शिखा पांडे, अहमदाबाद, गुजरात से, 22/11/2020

अल-सुबह सबसे पहले उठना। देर रात सबसे बाद में सोना। परिवार के एक-एक सदस्य की छोटी से बड़ी, हर चीज का ख्याल रखना। घर के भीतर कब, क्या और कैसे होना है, उस सबका सोचना। उसे करना और कराना। ये पहचान है भारतीय गृहिणी की।

भेदभावविनाशकं खलु दिव्यभाषा संस्कृतम्

टीम डायरी, 20/11/2020

धर्म, जाति, भाषा के नाम पर एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े होने की सूचना-सामग्री अथाह है। समाचार माध्यमों और कथित सामाजिक माध्यमों (Social Media) पर ऐसा कुछ एक ढूँढ़ने जाएँ, तो सैकड़ों की तादाद हाथ में आती है। पर उसी अँधेरी खोह में कोई टिमटिमाती सी एकाध रोशनी भी कभी मिल जाती है। जैसे यह वीडियाे। इसे किसने बनाया? इसमें दिख रहे कलाकार कौन हैं, कहाँ से हैं?

वैष्णवी द्विवेदी (तस्वीर साभार)

शरद शिव-स्तुति उत्सव

टीम डायरी, 30/10/2020

शरद पूर्णिमा पर भगवान कृष्ण को खीर का भोग लगाना। वृन्दावन की गोपियों के साथ उनके महारास को याद करना। उन्हें नौका विहार कराना। ये सब साल-दर-साल होता आया है। पर क्या कभी इस अवसर पर भगवान शिव की स्तुति के बारे में सोचा गया? शायद नहीं। या सोचा भी गया होगा तो बहुत कम। भाेपाल, मध्य प्रदेश से वैष्णवी द्विवेदी ने यह सोचा है। शरद पूर्णिमा का उत्सव और शिव की स्तुति। शरद-शिव-स्तुति-उत्सव। भरतनाट्यम के माध्यम से।

पृष्ठ