अपना पन्ना

अपने पिंजरे हमें ख़ुद ही तोड़ने होंगे

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 21/8/2021

यूँ तो रोज ही छुट्टी है, लेकिन इन दिनों रविवार का अपना मज़ा है। लिहाज़ा उस रोज़ सोचा कि कुछ बटन टूट गए हैं, उन्हें टाँक लूँ कमीज़ में। सो, सुई धागा खोजा पर मिला नहीं। दोपहर को याद आया। फिर जब सुई धागा मिला, तो बटन नहीं मिले। बटन मिले तो उनमें से लाल वाले गायब थे, जिनकी ज़रूरत थी। अन्त में वह कमीज़ ही भूल गया, जिसके बटन टूट गए थे। 

सम्यक स्मृति; कि हम मोक्ष के पथ पर बढ़ें, तालिबान नहीं, कृष्ण हो सकें

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 17/8/2021

यादें बड़ी कमाल की चीजें होती हैं। हम अपनी यादों में पूरे संसार को समेटे रहते हैं। ये यादें अच्छी, बुरी, दुख देने वाली और प्रसन्नता देने वाली हो सकती हैं। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि हम अपनी यादों में अपने दु:खद संस्मरणों को ज़्यादा समेटे रहते हैं। यही कारण है हम अपने अतीत से सीखते कम हैं। उसका स्मरण ज्यादा करते हैं। उन यादों से सीख कर आगे नहीं बढ़ते। उन्हें याद कर अवसाद में पहुँच जाते हैं। कहीं-कभी कट्टर हो जाते हैं। हिंसक भी हो उठते हैं। इसका ताज़ातरीन उदाहरण तालिबान है। न जाने कौन सी स्मृतियाँ हैं, जो इस संगठन को मानवीय रूप में बने रहने से रोकती हैं?

बड़ा दिल होने से जीवन लम्बा हो जाएगा, यह निश्चित नहीं है

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 14/8/2021

दिन के चौबीस घंटों में एकांत यूँ ही आता है, टुकड़ों में और हम उसमें एकसार होते हैं। फिर जीवन में लौट जाते हैं, जहाँ शोर है और सन्नाटा।  ---  कभी दूध को गर्म करें, अपनी आँखों के सामने। बहुत एकाग्रता लगती है। फोकस करना पड़ता है और अक्सर इन दोनों के होने के बाद भी उफनकर दूध बाहर निकल जाता है। जीवन में मौके ऐसे ही होते है प्रायः। ---

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सम्यक प्रयत्न; बोल्ट ने ओलम्पिक में 115 सेकेंड दौड़ने के लिए जो श्रम किया, वैसा!

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 10/8/2021

बुद्ध अपने प्रतीत्य समुत्पाद के तीसरे भाग अर्थात् समाधि की बात करते हैं। भारतीय दर्शन में समाधि अत्यधिक महत्त्वपूर्ण विचार है। बुद्ध समाधि में तीन चीजों को रखते हैं। इनमें पहली है, ‘सम्यक प्रयत्न’। प्रयत्न से यहाँ तात्पर्य है ‘व्यायाम’। हमने अक़्सर सुना होगा, “पहला सुख, निरोगी काया”। यानि जब हम स्वस्थ होंगे, तभी मन ठीक से कार्य करने की स्थिति में होगा। 

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जो जीवन को जितनी जल्दी समझ जाएगा, मर जाएगा

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 7/8/2021

मेरे कमरे में जब सुबह धूप आती है, तो बहुत गुनगुनी होती है। दोपहर तक परवान चढ़ती है और शाम फिर ठंडी पड़ने लगती है। लगता है जीवन में दुःख यूँ ही आते हैं।  --- शाम का तापमान कभी एक समान नहीं देखा मैंने अपने जीवन में। जबकि सुख और दुःख हर दिन समान थे। एकदम किसी अटल पहाड़ के समान। सुरंगें अक्सर उजालों भरी ही होती हैं। असल में हमें उस पार उजाला देखने के भ्रम सिखा दिए गए हैं।  --- ज़िन्दगी लम्बी या बड़ी नहीं होनी चाहिए। बस, अभी जो है, वैसी ही होनी चाहिए। अपने पूरे आकार और स्वरूप में। ताकि जो साँस अन्दर जा रही है, उसके साथ ही इसे आत्मसात कर सकें। पता नहीं हम अगली साँस में हों न हों। ---

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

सम्यक आजीविका : ऐसा कार्य, आय का ऐसा स्रोत जो ‘सद्’ हो, अच्छा हो

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 3/8/2021

कोरोना काल में न जाने कितने लोगों को अपनी आजीविका से विरत होना पड़ा। बहुतों ने इसे नई आजीविका के अवसर के रूप में देखा और नए उपक्रम खड़े कर दिए। इस दौर में एक तरफ़ कई लोग आजीविका खोने के कारण निर्धनता को प्राप्त हुए, वहीं दूसरी ओर कई लोगों ने विविध उपायों से खूब धन अर्जित किया। मुझे याद आ रहा है कि हमारे कई मित्रों को ज़रूरत के वक़्त जीवन-रक्षक औषधियों और जीवन-रक्षक यंत्रों  का कई गुना अधिक मूल्य चुकाना पड़ा। क्योंकि बहुत से औषधि विक्रेता निर्ममतापूर्वक उस समय केवल धन कमा रहे थे। अस्पतालों तक ने मानव जीवन के मुकाबले धन कमाने को वरीयता दी। यह

लम्बी दूरी तय करनी हो तो सिर पर कम वज़न रखकर चलो

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 31/7/2021

आज शाम मौसम अचानक बदल गया। दूध ख़त्म हो गया था फ्रिज में। बहुत हिम्मत करके बाहर निकला और गुमटी से दूध लिया। उसे जब रुपए दिए तो वापसी के लिए उसके पास चिल्लर नहीं थी। मैंने कहा, "कोई बात नहीं बाद में कर लेंगे हिसाब" तो वह बोला, "नहीं भैया जी, ले जाओ बाद में मैं भूल जाऊँगा।" मुझे समझ नहीं आया कि मात्र तीन रुपए की चिल्लर के लिए उसने अपने आप को प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर दिया। 

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

सम्यक कर्म : सही क्या, गलत क्या, इसका निर्णय कैसे हो?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 27/7/2021

मेरे मित्र के बॉस नेत्रहीन हैं। उनका मानना है कि उनके द्वारा किए गए सभी कार्य सही ही हैं। चाहे वे कार्य दूसरों की नज़र में ग़लत या अनुचित ही क्यों न हो। हमारी नज़र में हम अक्सर सही ही होते हैं। दुर्योधन अपनी दृष्टि से, कहीं से भी स्वयं को अनुचित कैसे बता सकता है। चाहे दुर्योधन के आदेश से भरी सभा में किसी महिला की गरिमा को ही क्यों न चोट पहुँचाई गई हो। 

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हम सब कहीं न कही ग़लत हैं

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 24/7/2021

पैदा होने के बाद ग़लत स्कूल में चला गया। वहाँ तीन ग़लत प्राचार्यों और 50-60 ग़लत शिक्षकों ने ग़लत पढ़ा दिया। गणित के बदले जीव विज्ञान विषय गलती से भर दिया प्रवेश फॉर्म में तो भुगतना पड़ा आजतक जीवन में। माध्यमों के खेल में असली खेल सीख ही नहीं पाया कभी। एक दिन जवाहर चौक, देवास में ग़लत जगह खड़े होकर केरल से आए नुक्कड़ नाटक के दल का भोपाल गैस त्रासदी पर नाटक देख लिया और जीवन देखने की दृष्टि ही बदल गई। उस दिन एक गलत बस में बैठा था और वह मुझे उस गाँव ले गई, जहाँ से बदलाव और विकास का नया रास्ता चुना मैंने। 

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सम्यक वचन : वाणी के व्यवहार से हर व्यक्ति के स्तर का पता चलता है

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 20/7/2021

“ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए, औरन को शीतल करे आपहुँ शीतल होए।” यह दोहा हम बचपन से सुनते-पढ़ते आ रहे हैं। लेकिन इसे अपनाते-अपनाते पचपन के हो जाते हैं। फिर भी ठीक से अपना नहीं पाते। कारण? अच्छे या सद्-व्यवहार से बोलना अत्यधिक कठिन है। जो चीजें हमें सरल दिखती हैं, जरूरी नहीं कि वे सरल ही हों। अगर इतनी सरल होतीं तो बुद्ध को ‘सम्यक-वचन’ पालन का उपदेश नहीं देना पड़ता। इस कठिन सरल व्यवहार के परिणाम को इस कहानी से समझते हैं।

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