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जाे जिनेन्द्र कहे गए, वे कौन लोग हैं और क्यों?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 30/11/2021

इन्द्रियों को जीत लिया है जिस व्यक्ति ने, वह जिन या जिनेन्द्र आदि विशेषणों से पुकारा जाता है। भारतीय धर्म-दर्शन इन्द्रियों पर विजय पाने की महत्त्वपूर्ण चर्चा करता है। प्रत्येक महर्षि, प्रत्येक महात्मा जितेन्द्रिय होने का उपदेश देते हैं। कठोपनिषद में ऋषि कहते हैं कि इन्द्रिय आदि का संयुक्त रूप यह शरीर मैं नहीं हूँ। इससे अलग विलक्षण नित्य चेतना हूँ। जो ऐसा जान लेता है, वह व्यक्ति सदा के लिए दुःख से रहित हो जाता है। 

जीवन में हमें ग़लत साबित करने वाले बहुत मिलेंगे, पर हम हमेशा ग़लत नहीं होते

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 27/11/2021

एक मैयत में गया था आज। घर में तो सब ठीक था। रास्ते में भी दुख उमग रहा था। पर श्मशान में मुखाग्नि से कपाल क्रिया के बीच फुर्सत के घंटों में हम सब लोगों ने उस मृतक को इतना ग़लत साबित किया कि यदि वह सुन लेता तो शायद जन्म के क्षण ही मरने का निश्चय कर लेता। दिलचस्प यह कि बाहर निकलते समय श्मशान वैराग्य का टैग सबके मन मस्तिष्क और आत्मा पर नत्थी था। 

कब अहिंसा भी परपीड़न का कारण बनती है?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 23/11/2021

प्राचीन काल की बात है। किसी गाँव में चन्द्रभूषण नामक एक विद्वान पंडित रहते थे। उनकी वाणी में गज़ब का आकर्षण था। भागवत् कथा सुनाने में निपुण थे। उनकी वाणी से कथा सुनकर लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे। इसीलिए उनके घर रोज कथा सुनने वालों की भीड़ लगी रहती। दूर-दूर से लोग चन्द्रभूषण से कथा सुनाते थे। उसी गाँव में दूसरे पंडित जी रहते थे। उनका नाम था, नंबियार। पढ़े-लिखे तो वे बहुत थे। लेकिन थोड़े घमंडी स्वभाव के थे। स्वयं को बहुत बड़ा विद्वान भी समझते थे। सोचते कहाँ कल का यह बच्चा चन्द्रभूषण, जो अटक-अटक कर कथा पढ़ता है और कहाँ मैं शास्त्रों क

ऊँचाईयाँ नीचे देखने से मना करती हैं

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 20/11/2021

एक मीना बाज़ार लगता था, हर वर्ष नवरात्रि में। उसमें घूमने जाने का मज़ा ही कुछ और होता था। बड़े-बड़े झूले उसकी पहचान थी। कई बार हिम्मत की कि किसी एक झूले में बैठूँ पर अन्दर का डर हमेशा हावी रहा। ऊँचाई, चक्राकार गति और कर्कश आवाज़ें नीचे से ही सुनकर भयभीत हो जाता था। रोपवे पर आज भी बड़ी हिम्मत के बाद बैठ पाता हूँ। नीचे देख नहीं पाता। ऊँचाईयाँ नीचे देखने से मना करती हैं। जुगुप्सा रूपी भय दर्ज़ करती है, दिलो-दिमाग़ पर। इसलिए ऊँचाई कभी पसन्द नहीं आई। 

सोचिए कि जो हुआ, जो कहा, जो जाना, क्या वही अंतिम सत्य है

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 16/11/2021

तैत्तिरीय उनिषद् में एक प्रसंग है। ऋषि भृगु और उनके पिता का। ऋषि भृगु अपने पिता वरुण के पास जाते हैं और पूछते हैं, परमात्मा कैसा है? वरुण कुछ विचारमग्न होकर पुत्र को देखने लगते हैं। और भृगु उस परमात्मा को पाने की उत्कट अभिलाषा व्यक्त कर देते हैं।

स्मृतियों के जंगल मे यादें कभी नहीं मरतीं

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 13/11/2021

दो बार फोन लगाया पर नहीं उठाया, आख़िर रख दिया। सोचा कि अगला ड्यूटी पर होगा और जब समय मिलेगा तो ख़ुद कर लेगा। आख़िर रात में स्क्रीन पर नाम चमका तो लगा कि चलो, ज़वाब तो आया। बात शुरू की तो कुछ समझ नहीं आ रहा था। जैसे कोई गम्भीर हकलाने वाला हो और आवाज़ लथड़ रही हो। बहुत हिम्मत करके वो लगभग चार मिनिट में इतना ही बोल और समझा पाया कि टेक्स्ट मैसेज से बात करो। 

जो क्षमा करे वो महावीर, जो क्षमा सिखाए वो महावीर...

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 9/11/2021

एक सेठ ने अपने छोटे भाई को व्यापार शुरू करने के लिए कुछ धन दिया। लेकिन छोटे भाई ने व्यापार जमने के बाद धन वापस नहीं किया। धीरे-धीरे धन के कारण दोनों भाइयों में विवाद गहरा होता चला गया। दोनों में बातचीत बन्द हो गई। कई वर्ष बीत गए। 

सेठ का मन हमेशा इस बात से व्यथित रहता। किसी दिन सेठ ने एक महत्मा से अपनी व्यथा-कथा सुनाई। महात्मा ने कहा, “आप अपने भाई से क्षमा माँग लीजिए। आपकी व्यथा दूर हो जाएगी।” 

इस पर सेठ कहने लगे, “मैं क्यों क्षमा माँगूं?’ 

विचित्र हैं हम.. जाना भीतर है और चलते बाहर हैं, दबे पाँव

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 6/11/2021

जिनसे उम्र भर लड़ते-भिड़ते रहते हैं, वे एक दिन हम सबसे दूर हो जाते हैं। सदा के लिए संसार त्याग देते हैं। हम दुख मनाते हैं। मातम में रहते हैं। फिर धीरे-धीरे पटरी पर लौटते हैं और दोबारा सुख खोजते हैं। खुशियाँ तलाशते हैं पर यह भूल जाते हैं कि खुशियाँ रिश्तों में नहीं हैं। सम्बन्धों में नहीं, बल्कि हमारे भीतर हैं। 

बौद्ध अपनी ही ज़मीन से छिन्न होकर भिन्न क्यों है?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 26/10/2021

अभी तक विविध कड़ियों के माध्यम से बुद्ध के सिद्धान्तों, उपदेशों, उनके जीवन की घटनाओं का परिचय प्राप्त किया। इन विविध प्रसंगों से यह ज्ञात होता होता है कि बुद्ध ने भारतीय परम्परा से प्राप्त ज्ञान और अनुभव से, अपने उपदेशों के जरिए समाज में सरल व्यवस्था बनाने का प्रयास किया। 

किसी के भी अतीत में जाएँगे तो कीचड़ के सिवा कुछ नहीं मिलेगा

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 23/10/2021

किसी के भी अतीत में जाएँगे तो कीचड़ के सिवा कुछ भी नहीं मिलेगा। मेरे से लेकर तुम्हारे अतीत तक इतना कीचड़ है कि हम यह पूरी धरती 10 बार ढाँक सकते हैं। इसलिए बस वर्तमान में रहें, जब भी किसी से मिलें मुस्कुरा दें- अपना और उसका वही चेहरा ज़ेहन में रहे, जो अभी साँस ले रहा है। थोड़ा भी दिमाग़ पर जोर डालेंगे तो दिक्क़त होगी। 

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