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लड़ना न पड़े, ऐसी व्यवस्था आज तक हम किसी सभ्यता में बना नहीं पाए हैं

संदीप नाइक, देवास, मध्य प्रदेश से, 12/3/2022

खुशियाँ छोटी थीं इतनी कि नजर नहीं आती थीं। शायद दरवाज़े पर ‘शुभ-लाभ’ लिखा होने या सुबह माँ की बनाई रंगोली में लक्ष्मी के पाँव देखकर लौट जाती हों। कम खर्च और मितव्ययिता का अर्थ तो अब इस उम्र में मालूम पड़ रहा है। पर उस समय में लम्बा चलना या मन मसोसकर रह जाना, मानो जीवन का स्थाई भाव था। लम्बी-लम्बी बहसों का परिणाम यह होता कि कामरेड लोग कहते कि तुम सुखी हो, जो इतना कुछ है तुम्हारे पास। यह कहकर वे लोग एक लम्बी गाड़ी में, जिसमें विदेशी किस्म की शराब भरी होती, एसी लगा होता, में बैठकर चले जाते। उनके घरों के गमले और पौधों का खर्च मेरी एक माह की तनख़्वाह के बराबर होता था। उनके घरों के एक कप, जो अक्सर हर

गुणवान नारी सृष्टि में अग्रिम पद धारण करती है...

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 8/3/2022

आज ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ है। पूरा विश्व महिला सशक्तिकरण और महिलाओं के अधिकारों पर व्याख्यान दे रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में, मैं भी जब जैनदर्शन की इस श्रृंखला का यह भाग महिला-केन्द्रित होकर लिखने की इच्छा से बैठा, तो सोचने लगा कि भारतीय समाज कितना उदार रहा है। भारतीय समाज में प्रत्येक विचारधारा पुरुष के पक्ष में नहीं, अपितु शक्ति की आराधना में लीन दिखाई देती है। मुझे इस बात कर गर्व की अनुभूति हुई कि भारतीय समाज की श्रेष्ठता सम्भवत: इसी में है कि वह मानवीय है। यहाँ महिला को अशक्त माना ही नहीं गया, जो उसके सशक्तिकरण के लिए आन्दोलित होने की आवश्यकता दिखाई दे। 

चलो जीती हूँ आज से, मैं सिर्फ़ अपने लिए..

विशी दाहिया, बहादुरगढ़, हरियाणा से, 8/3/2022

चलो जीती हूँ आज से, मैं सिर्फ़ अपने लिए। 

भूल जाती हूँ बचपन से, जीना माता-पिता के लिए  शादी के बाद पति और बच्चों के लिए  चलो तोड़ती हूँ, आज सारे बन्धन, मैं सिर्फ़ अपने लिए। 

चलो मुश्किल है मुझे समझना, आसान बनाती हूँ, सबके लिए  छोड़ती हूँ ससुराल में, सबकी हाँ में हाँ मिलाना  शादी के बाद सिन्दूर और बिन्दी लगाना   चलो छोड़ती हूँ  हर क़दम पे, मैं रिश्तों का बोझ उठाना। 

मार्च आ गया है, निश्चित ही ब्याज़ आएगा, देर-अबेर, उम्मीद है, फिर,,,

संदीप नाइक, देवास, मध्य प्रदेश से, 5/3/2022

खूब नौकरियाँ पकड़ीं और छोड़ीं। मानो जीवन में यही सब करने के लिए पैदा हुआ था। लोग कहते हैं ईश्वर ने जब जन्म दिया है तो किसी उद्देश्य के साथ ही दिया होगा। संसार में महान और बड़ा काम करने के लिए। हम चौरासी लाख योनियों में भटककर आते हैं और अपने कर्मों से मनुष्य योनि पाने की यह पुण्याई अर्जित करते हैं। लेकिन मुझे कभी नहीं लगा यह। तनाव, अवसाद, त्रासदी और ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाने की क़श्मकश में सुख का मुँह देखा ही नहीं कभी। हमेशा अपने आगे एक समस्या मुँह बाए खड़ी देखी। और जब तक इससे निजात पाता, तब तक अम्बार खड़ा मिलता समस्याओं का। जिन्दगी धूँ-धूँ जलते दानावल में पटकी जाती। जैसे, कोई

चेतना लक्षणो जीव:, ऐसा क्यों कहा गया है?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 1/3/2022

मानव जीवन की जैसे-जैसे समझ विकसित होती है, वैसे-वैसे संसार और जीवन को जानने की मानव की इच्छा बलवती होने लगती है। इसके परिणाम में वह अपनी समझ अपनी बुद्धि और अपने तर्कों का प्रयोग करना शुरू कर देता है। वह तब तक नहीं रुकता जब तक उसके मन में पैदा होने वाले प्रश्न समाप्त नहीं हो जाते। हालाँकि मानव अपनी युक्तियों का प्रयोग जितना अधिक करता है, वह उतना ही अधिक उलझता प्रतीत होता है। कई दर्शन ‘नेति-नेति’ तक कह उठते हैं। और अंततः वह बाहरी समाधान के अभाव में अपने अन्दर की गहराइयों में उतरने लगता है। इस अन्तर्मन की गहराइयों की अनुभूतियों को अपने-अपने अनुभव से अभिव्यक्त करता है। 

एक समय ऐसा आता है, जब हम ठहर जाते हैं, अपने आप में

संदीप नाइक, देवास, मध्य प्रदेश से, 27/2/2022

संसार में समुद्रों की कमी नहीं है और इसका अर्थ यह भी है कि पानी की कमी नहीं है। पानी, जो हर कहीं ढल जाता है, रंग रूप बदल लेता है। पर मेरे पास एक मटका है, जिसे मैंने बरसों से सम्हाल रखा है। पानी भरने और उलीचने की नियमित प्रक्रिया में वह इतना पक गया है कि अब उसके फूटने की गुंजाइश बहुत कम बची है। हालाँकि इधर शाम होते ही वह टपकने लगता है। हर 10-20 मिनिट बाद जब एक बूँद गिरती है, तो उसका शोर ब्रम्हांड में यूँ दर्ज होता है, मानो उल्का पिंड टकराए हों। और मैं अब मानकर चलता हूँ कि मटका अब फूटेगा नहीं। यूँ ही टप, टप, टप करके खाली होता जाएगा। एक दिन निर्जल हो जाएगा। फिर उसकी मिट्टी, वह गार जिस पर कुछ न

जानते हैं, जैन दर्शन में दिगम्बर रहने और वस्त्र धारण करने की परिस्थितियों के बारे में

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 22/2/2022 

आजकल समाज में वस्त्र-विशेष (हिज़ाब) को लेकर उथल-पुथल चल रही है। इसके पक्ष-विपक्ष में अज़ीब-अज़ीब तर्क दिए जा रहे हैं। इसके समर्थक मुँह सहित स्त्री का पूरा शरीर ढँकने सम्बन्धी अपने धार्मिक क़ायदों की दलील दे रहे हैं। वहीं, विरोध करने वाले ये तक कहते सुने जा रहे हैं कि अगर जैन सम्प्रदाय के लोग दिगम्बर होकर कक्षाओं में जाने लगें तो क्या होगा? या नागा साधु विश्वविद्यालय जाने की ज़िद करने लगें तो? 

सब भूलना है, क्योंकि भूले बिना मन मुक्त होगा नहीं

संदीप नाइक, देवास, मध्य प्रदेश से, 19/2/2022

भूलना है बहुत कुछ। मसलन- वे रास्ते जो अब भी ख़्वाबों में भटकते हुए आ जाते हैं। वे बेज़ुबान आँखें जो रास्ता खोज रही थीं। सम्भवतः मंज़िलें भी। पर मैं आसमान से हट ही नहीं रहा था, ज़मीन पर खड़े होकर। मेरे कान उस टिटहरी की ओर लगे थे, जहाँ से अब उसके लौटने की उम्मीद नहीं थी। उन सूनी दुपहरियों को भूलना चाहता हूँ, जहाँ तेज गर्मी में पीपल और बरगद के नीचे गाँव के गाँव खाली पड़े थे महीनों से। और जो लोग चैत काटने गए थे लौटे नहीं थे। कुछ बुज़ुर्गों ने फिर भी मुझसे गुफ़्तगू की थी। एक बच्चे ने हैंडपम्प से खींचकर पानी पिलाया था। उस मिठास और ठंडेपन को भूलना चाहता हूँ। 

एक पल का यूँ आना और ढाढ़स बँधाते हुए उसी में विलीन हो जाना, कितना विचित्र है न? 

संदीप नाइक, देवास, मध्य प्रदेश से, 12/2/2022

एक पल स्थिर हो जाना, एक पल ठहर जाना। एक पल की खुशी, एक पल के दुख में जीवन खपा देना। एक पल के इंतज़ार की पीड़ा, एक पल की मुलाकात। एक पल ठिठुरना, एक पल की मुस्कुराहट। एक पल का साथ, एक पल में सब कुछ छोड़कर गुजर जाना। एक पल में विलोपित हो जाना और एक पल में ख़त्म हो जाना। और इस एक पल का यूँ आना और ढाढ़स बँधाते हुए उसी पल में विलीन हो जाना कितना विचित्र है न? 

प्रेम जीवन है, जीवन की अपनी गति है, मदमस्त लय है

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 9/2/2022

पटरियों ने हमेशा समानान्तर रहकर मूक साथ निभाया। पहाड़ों ने धरती और आकाश के बीच रहकर जोड़ने का काम किया। नदियाँ अपने उद्गम से निकलीं तो समुद्र में मिल जाने तक कल-कल करती रहीं। उसका रोना किसी ने नहीं देखा। अनथक चलती रहीं, जोड़तीं रहीं। जो मिला, उसे अपने में समा लिया और कभी उफ्फ़ नहीं किया किसी से।

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