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झुकना, इसके मायनो की बयानी उम्दा है। हम जिस समाज मे इस वक़्त झुकते-झुकाते फिर रहे हैं वो समाज खुद वर्गीकरण का शिकार है। एक तरह रीढ़ सीधी रखने का ज्ञान देता है तो दूसरी ओर, 'झुकने वाला ही बढ़ता है' जैसे उदाहरण हमारे सामने रखता है। हालांकि झुकना, एक तात्कालिक फैसला है, जिसमे आप अपनी मंशा के अनुरूप तर्क निकाल सकते हैं लेकिन अथाह विचार सागर में ये तर्क भी अपनी मौजूदगी खो देते है। झुकना, अब भाव नहीं व्यवहार का हिस्सा बन गया है। उम्दा बयानी के लिए हमेशा की तरह आपको ढेर बधाई

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