छोटी सी बच्ची का बड़ा सा काम। ‘नॉलेज पिल्स’ यानि ज्ञान की गोली के रूप में। दिल्ली से देवांशी वशिष्ठ ने यह कोशिश शुरू की है। #अपनीडिजिटलडायरी के पाठकों को ‘नॉलेज पिल्स’ देने। इसमें सामान्य ज्ञान की कुछ चुनिन्दा घटनाओं की जानकारी वे दे रही हैं। भाषा अंग्रेजी है उनकी। क्योंकि उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि अंग्रेजी माध्यम वाली है। हालाँकि यह अंग्रेजी ऐसी नहीं जो समझी न जा सके। देवांशी की कोशिश होगी कि वे रोज इस तरह की नॉलेज पिल्स डायरी के पाठकों को दे सकें। फिर भी वे अभी छोटी हैं तो सम्भव है, कभी सिलसिला चूके भी। हालाँकि डायरी के पाठकों का स्नेह उन्हें भरपूर मिला तो उनका प्रोत्साहन बढ़ेगा और
हिन्दी फिल्मों के बड़े अभिनेता अमिताभ बच्चन अक्सर अपने जीवन का एक किस्सा सुनाया करते हैं। वे बताते हैं, “मैं छोटा ही था, जब बाबूजी ने जब मुझे जीवन के एक विचलित मोड़ पर ये सीख दी थी- मन का हो तो अच्छा, न हो तो ज्यादा अच्छा। उस वक्त मेरी समझ में नहीं आया कि जो मन का न हो वो ज्यादा अच्छा कैसे हो सकता है? लेकिन बाद में जब उन्होंने समझाया तो समझ गया कि अगर तुम्हारे मन का नहीं हो रहा है, तो समझो ईश्वर के मन का हो रहा है। और ईश्वर हमेशा तुम्हारा अच्छा ही चाहेंगे, इसलिए ज्यादा अच्छा।”
प्रिय मानसून,
कहाँ हो तुम? तुम्हें मालूम भी है, कब से यहाँ सब तुम्हारी राह देख रहे हैं? अब और देर मत करो आ जाओ। मैंने अख़बारों में तो पढ़ा था कि तुम इस बार जल्दी आ रहे हो। जून तक आ जाओगे। लेकिन यहाँ तो जुलाई भी एक-एक दिन बीतता जा रहा है और तुम्हारी कोई खोज ख़बर ही नहीं।
कल मैंने एक छोटी-सी गुहार लगाई तो तुम एक फुहार देकर लौट गए। फिर ढाक के वही तीन पात।
आचार्य रजनीश ‘ओशो’ के प्रवचनों का हिस्सा है, ये ऑडियो। एक बौद्ध कथा के जरिए वे बता रहे हैं, ‘तेज गए तो भटक जाओगे, धीरे गए तो पहुँच जाओगे।’
वे ध्यान दिला रहे हैं कि अगर हमें कुछ साधना है तो हमारी गति धीमी होनी चाहिए। क्योंकि तेज गति से हम सिर्फ़ क्षणभंगुर भौतिक सुख-सुविधाएँ, पद, पैसा आदि ही हासिल कर सकते हैं। सुख और शान्ति नहीं। आनन्द नहीं।
एक और उदाहरण देते हुए वे कह रहे हैं, अगर बड़े पेड़ की तरह कद हासिल करना है, अपनी छाँव में जीवों को आसरा देना है, उन्हें मधुर फल देना है, सालों-साल टिके रहना है, तो धीरे-धीरे बढ़ना होगा। एकदम फर्राटे से नहीं।
जीवन में कई बार छोटी-छोटी कहानियाँ बड़ी सीख दे जाती हैं। लेकिन वे कहानियाँ सबसे सुन्दर होती हैं, जो इंसानियत का पाठ पढ़ाती हैं।
इस छोटी-सी कहानी को सुनकर महसूस किया जा सकता है कि हमें किस तरह सबसे पहले अपने कर्त्तव्य पर ध्यान देना चाहिए। पैसा तो आना-जाना है। इस पल किसी हाथ में है, तो अगले में और के हाथ में होगा।
होली त्यौहार है रंग का, उमंग का। पर अगर दिलों में कड़वाहट घुली हो तो जीवन में न कोई उमंग रह जाती है, न रंग। इसीलिए हर साल होली आती है। हमारे बीच की कड़वाहट मिटाने के लिए। रंग और उमंग चढ़ाने के लिए। हालाँकि एक होली के दिन तो शायद यह सम्भव हो भी जाता हो, मगर क्या साल के पूरे 365 दिन, हर दिन हम कड़वाहट भूलकर रंग, उमंग के साथ रह पाते हैं? ज़वाब इसका बहुतों के लिए मुश्किल हो सकता है।
जीभ की उम्र लम्बी क्यों होती है? बहुत प्रासंगिक और रोचक-सोचक सा सवाल है। ज़वाब सोचना चाहें तो सोच सकते हैं। अगर सुनना चाहें तो यह कहानी सुनी जा सकती है। छोटी है, पर सवाल का ज़वाब पूरा देती है।
कई बार कहा सुना गया है कि ‘हीरे की कीमत, जौहरी ही जानता है’। लेकिन क्या हमने इसी कहावत के दूसरे पहलुओं को भी जाना-समझा है? मसलन, इसका एक दूसरा पहलू कि ‘कोई पत्थर दरअसल हीरा होता ही तब है, जब वह सही हाथों में पहुँचता है।’ और तीसरा ये कि ‘जब तक पहचाना न जाए, तराशा न जाए, पत्थर हीरा नहीं होता।’ बहुत थोड़े से फर्क के साथ कही गई ये तीनों बातें अहमियत बड़ी रखती हैं। अपनी-अपनी, अलहदा।
मैं, जल, आपका प्राण। मेरी एक घूँट में ही जन्नत का आराम मिलता है। जब आप मुझे पीते हैं तो पानी हो जाता हूँ। जब सूर्य को चढ़ाते हैं, तो जल। मैं पंचमहाभूतों में से एक हूँ, जिनसे सृष्टि की रचना हुई है। मेरे बिना सब सून है। इसीलिए रहीम कह गए हैं... रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।।
निश्चित रूप से यह एक बड़ा सवाल है कि हमारा रसूख यानि ‘स्टेटस’ सही मायने में आखिर बड़ा कैसे होता है? हमारा दिल बड़ा होने से या दिमाग चढ़ा होने से?