क्या हम प्रतिभाओं को परखने में गलती करते हैं?

क्या हम प्रतिभाओं को परखने में, उनका आकलन करने में गलती करते हैं? मेरे दिमाग में यह सवाल अक्सर ही आता है। बीते दो-ढाई दशक से बच्चों को क्रिकेट का प्रशिक्षण देने के दौरान ऐसे तमाम वाक़ये पेश आए हैं, जब बार-बार यह सवाल ज़ेहन में उभरा। और अभी जब किसी मित्र ने वॉट्सऐप पर मुझे भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान राहुल द्रविड़ का कथन (Quote) भेजा, तो सवाल फिर जीवन्त हो उठा।

राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी (एनसीए) के वर्तमान मुखिया द्रविड़ के शब्दों में, “हम प्रतिभा के तौर पर क्या देखते हैं? मुझे लगता है, मैं ख़ुद भी यह गलती कर चुका हूँ। हम देखते हैं कि खिलाड़ी गेन्द पर कितनी अच्छी तरह से प्रहार कर रहा है। कितनी ख़ूबसूरती और कितने सटीक समय (Timing) के साथ। लेकिन उसका इरादा, उसका हौसला, उसका अनुशासन, उसके तेवर? ये भी तो प्रतिभाएँ हैं।”

असल में मुझे भी यही लगता है। हम प्रतिभाओं को परखने में अक्सर गलती कर जाते हैं। बतौर प्रशिक्षक (Coach), संरक्षक (Mentor), मार्गदर्शक (Guide), शिक्षक और बतौर माता-पिता भी। शायद यही वजह है कि बड़ी तादाद में प्रतिभाएँ हमारे हाथ से छिटक जाती हैं। सामने नहीं आ पातीं या उभर नहीं पातीं। इसीलिए द्रविड़ के बहाने सही, हमें इस मुद्दे पर सोचना चाहिए। अपने बच्चों, शिष्यों और उनके भविष्य के लिए।

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(ज्योति प्रकाश, भोपाल के जाने-माने क्रिकेट प्रशिक्षक हैं। ख़ुद अच्छे खिलाड़ी रहे हैं। खेलों पर अच्छी पकड़ रखते हैं। उन्होंने वॉट्सऐप सन्देश के जरिए यह लेख #अपनीडिजिटलडायरी को भेजा है। )

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भाई बात सही है। खिलाड़ी, सेलेक्टर्स, कोच, अफसर, नेता, चपोता, सब गलती करते रहते हैं।

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