किसी का पत्थर, किसी के लिए हीरा

कई बार कहा सुना गया है कि ‘हीरे की कीमत, जौहरी ही जानता है’। लेकिन क्या हमने इसी कहावत के दूसरे पहलुओं को भी जाना-समझा है? मसलन, इसका एक दूसरा पहलू कि ‘कोई पत्थर दरअसल हीरा होता ही तब है, जब वह सही हाथों में पहुँचता है।’ और तीसरा ये कि ‘जब तक पहचाना न जाए, तराशा न जाए, पत्थर हीरा नहीं होता।’ बहुत थोड़े से फर्क के साथ कही गई ये तीनों बातें अहमियत बड़ी रखती हैं। अपनी-अपनी, अलहदा। 

ये बातें, कहावतें हमारे जीवन से भी जुड़ती हैं। हमारे अपने व्यक्तित्व को गढ़ने में काम आती हैं। हमारे साथ जुड़े लोगों को जानने, पहचानने, समझने में मदद करती हैं। यूँ कि हम में से हर किसी में कोई न कोई ख़ासियत होती है। जरूरत रहती है, तो बस उसे तराशने की। चमकाने की। पहचानने की और फिर अहमियत देने की। जब ये सब चीजें एक साथ आ मिलती हैं, तो किसी का पत्थर, किसी के लिए हीरा हो जाता है। 

...ये जो कहानी है न, इसका मर्म यही है। इसीलिए सुनने लायक है। 

----------

(शिखा पांडे, गृहिणी हैं। उन्होंने यह कहानी व्हाट्स एप सन्देश के जरिए #अपनीडिजिटलडायरी को भेजी है।) 

Comments

Comment: 
6263090212

Add new comment

Plain text

  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <img> <h2> <h1> <h3> <div> <span> <section> <b> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd> <p> <table> <td> <tr><iframe>