निर्मल वर्मा की जयन्ती और एक प्रश्न, किताबों से बड़ा ज्ञान या ज्ञान से बड़ी किताबें?


किताबें ज्ञान का स्रोत हैं या फिर ज्ञान किताबों के सृजन का माध्यम? इस प्रश्न पर विचार का भरा-पूरा कारण दिया है इस कविता ने। प्रश्न के मद्देनज़र इस कविता की हर लाइन गौर करने लायक है।  

ये कविता हिन्दी के जाने-माने कवि संजय चतुर्वेदी की है। इसे (वीडियाे में) आावाज़ दी है, उनके परिचित, प्रशंसक सन्तोष शुक्ल ने। इसे #अपनीडिजिटलडायरी​ के लिए व्हाट्स एप सन्देश के रूप में भेजा है, अनुराग ने, जो ख़ुद पेशे से पत्रकार, लेखक हैं। बड़े अख़बार में काम करते हैं।

अनुराग ने लिखा है, “इटावा, उत्तर प्रदेश में जन्मे संजय जी चार दशकों से लेखन कार्य में संलग्न हैं। अपने तरीके के अनोखे कवि हैं। उनके काव्य संसार के कई आयाम चालू हिन्दी कविता से अलहदा हैं। बगैर लाग-लपेट के वे अपनी बात कहने के लिए जाने जाते हैं।”

अनुराग के मुताबिक, “आज की धूप में कुछ लय थी, संगीत था। तो संतोष जी ने उनकी कविता ‘पुस्तक मेले’ की कुछ पंक्तियाँ गुनगुना दीं। रिकॉर्डिंग हो गई तो सामाजिक माध्यमों (Social Media) के ज़रिए इसे लोगों तक पहुँचाने का लोभ संवरण न कर सका।”

चूँकि #अपनीडिजिटलडायरी​ भी साहित्य, संगीत, कला, संस्कृति जैसे मसलों से ‘सरोकार’ रखती है, इसीलिए यह कविता यहाँ भी दर्ज़ की जा रही है।

सुखद संयोग है कि आज जब यह कविता और वीडियो डायरी पर दर्ज़ हो रहा है तो हिन्दी के जाने-माने कथाकार, लेखक निर्मल वर्मा की जयन्ती भी है। निर्मल वर्मा, जिनके बारे में उनकी पत्नी गगन ने एक बार बीबीसी काे दिए साक्षात्कार में बताया था, “'वे एक-एक शब्द का घंटों बैठकर इन्तज़ार करते थे। इतनी मुश्किल से लिखे गए वाक्यों को उतनी ही निस्संगता से काट भी देते थे, अगर भाए नहीं तो।”  इसी में वे आगे बताती हैं, “अन्तिम समय तक निर्मल हर दिन लगभग 12-13 घंटे काम किया करते थे।" 

और उनका काम क्या था? पठन-पाठन (विभिन्न किस्म की पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएँ), फिर चिन्तन-मनन (एक-एक शब्द का घंटों इन्तज़ार) और इसके बाद लेखन (किताबों का सृजन)। 

निर्मल वर्मा जैसे जितने भी बड़े कवि, कथाकार, साहित्यकार हुए हैं, उन सभी ने इसी क्रम का पालन किया है। पूरी ज़िन्दगी। पूरे अनुशासन के साथ। इसीलिए किताबें (जो उन्होंने पढ़ीं) कभी उनके ‘ज्ञान’ (चिन्तन-मनन विवेक) से ऊपर नहीं हो पाईं। 

हालाँकि वर्तमान दौर में शायद यह क्रम उलट गया है। सम्भवत: इसीलिए संजय चतुर्वेदी जैसे कवि को ऐसा लिखना पड़ा है, “हुई ज्ञान से बड़ी किताबें... अर्थतंत्र के पुल के नीचे रखवाली में खड़ी किताबें।।”

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